गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २४०/२४४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ ।
साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥२४०॥
साधना को ही अपना व्यसन मानने वाले भक्तजन उस इन्द्रियातीत ब्रह्म के दर्शन के लिए सत्पुरुषों का संग करते हैं । कुछ काल तक ब्रह्माकार वृत्ति की स्थिर बनाते रहते हैं । फिर उसी में स्थिर वृत्ति से ब्रह्म का दर्शन कर के ब्रह्म में मिल जाते हैं ।
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राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ ।
मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥२४१॥
भगवान भी अपने निज भक्तों को प्रेमरस परिपूर्ण पात्र से भक्ति रस को बार बार पिला कर अपने में अनुरक्त कर उन्मत्त बना देता है । वे भी भक्तिरस में डूबे हुए, अंतःकरण की वृत्ति से उसका पान कर भवसागर से पार हो जाते हैं ।
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भक्ति अगाध
दादू भक्ति निरंतर राम की, अविचल अविनाशी ।
सदा सजीवन आत्मा, सहजैं परकाशी ॥२४२॥
निरंजन निराकार के अविचल एवं अविनाशिनी भक्ति सद्गुरु की कृपा से ही मिलाती है और उसी भक्ति के प्रभाव से साधक अजर अमर भाव प्राप्त कर पाता है अर्थात भवबंधन से मुक्त हो जाता है ।
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दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध ।
इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥२४३॥
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख ।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहैं शेष ॥२४४॥
भगवान राम शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, परात्पर एवं अगाध रूप हैं । उनकी भक्ति भी वैसी ही अगाध है । इन दोनों का कोइ निश्चित परिमाण नहीं है क्योंकि वे दोनों ही अनंत हैं ।
(क्रमशः)

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