#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।*
*मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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बोक१ वक्त्र२ डाढी बड़ी, रींछ सु डाढी रूप ।
रज्जब रट३ बिन रोम बल, परस४ न तत्त्व अनूप ॥४५॥
बकरे१ के मुख२ पर भी बड़ी डाढी होती है, रीछ तो डाढी रूप ही होता है, बिना नाम की रटन३ लगाये डाढी के केशों के बल से अनुपम तत्त्व ब्रह्म से मिलन४ नहीं होता ।
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निर्गुण सहगुण बीज द्वै, अवनि आतमा माँहिं ।
नाम नीर सौं पुष्ट ह्वै, आसै आसण जाँहिं ॥४६॥
पृथ्वी में बीज रहते हैं, वे जल से पुष्ट होकर जैसी उनमें वासना है वैसे ही अंकुर निकल आते हैं, वैसे ही जीवात्माओं में निर्गुण - सगुण भावना है, वे नाम चिन्तन से पुष्ट होकर अपनी - अपनी प्रीति के अनुसार निर्गुण तथा सगुण को प्राप्त होते हैं ।
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नाद नीर वर्षा विपुल, प्राण पुहमि भरपूर ।
रज्जब काढहिं जाति के, प्रकृति प्राण अंकूर ॥४७॥
जल की वर्षा बहुत हो, पृथ्वी के लिये परिपूर्ण हो जाय तो भी बीजों से अंकुर तो अपनी - अपनी जाति के ही निकलेंगे, वैसे ही उपदेश रूप शब्द बहुत सुनने को मिलें तो भी प्राणियों से विचार तो अपनी अपनी प्रकृति अनुसार ही प्रगट होंगे ।
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लिखे फटकड़ी फहम१ सौं, कागद कमल सु माँहिं ।
नीर नाद२ सौं भीजतै, अक्षर उघड़ सु जाँहिं ॥४८॥
कागज पर फिटकरी से लिखे हुये अक्षर जल में भीगने से उघड़ जाते हैं, वैसे ही गुरु के हृदय - कमल में ज्ञान१ द्वारा अंकित विचार शिष्य के प्रश्न रूप शब्द२ से निकल आते हैं ।
(क्रमशः)

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