गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

= निगुणा का अँग(३३ - ७/९) =

#daduji


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*निगुणा का अँग ३३*
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कोटि वर्ष लौं राखिये, बँसा चँदन पास । 
दादू गुण लीये रहे, कदे न लागै बास ॥७॥ 
कोटि वर्ष तक बाँस को चँदन के पास रखने पर भी वह अपने बाँसपने के गुण को ही लिये रहता है, चन्दन की सुगन्ध उसमें नहीं प्रविष्ट होती । वैसे ही अज्ञानी कृतघ्न को चाहे दीर्घकाल तक सँत के पास रक्खो तो भी वह अपने कृतघ्नता रूप दोष को नहीं त्यागता और न भक्ति - ज्ञानादि को धारण करता है । 
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी माँहिं । 
दादू आडा अँग है, भीतर भेदै नाँहिं ॥८॥ 
कोटि वर्ष तक पत्थर को जल में रक्खो तो भी उसके कठौरता रूप लक्षण की आड़ होने से जल उसमें प्रविष्ट होकर उसे नर्म नहीं कर सकता । वैसे ही अज्ञानी कृतघ्न को दीर्घकाल तक सँत के पास रक्खो तो भी उसके कृतघ्नता रूप लक्षण की आड़ होने से सँत वचन उसके भीतर के अज्ञान को नहीं काट सकते ।
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कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग ।
दादू रोम का अंतरा१, पलटे नाँहीं अँग ॥९॥
एक बाल जितनी दूरी१ बीच में रखकर कोटि वर्ष तक लोहे को पारस के पास रक्खो तो भी लोहा सुवर्ण नहीं हो सकेगा । वैसे ही किंचित् भी कृतघ्नता रूप दोष रहने पर सँत के संग से कृतघ्न व्यक्ति भक्त नहीं हो सकता । 
(क्रमशः)

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