शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग १३३/१३७

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
अरवाह मकामे हस्त(आत्मवादी के लक्षण)
इश्क इबादत बंदगी, यगानगी इखलास ।
मिहर मुहब्बत, खैर खूबी,नाम नेकी पास ॥१३३॥
अब मुमुक्षु पुरुष के लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं । प्रेमपूर्वक ईश्वरोपासना, सत्पुरुषों की सेवा, सब जगह एक्य भावना, सब से मित्रता, दीनों पर दया, सज्जनों से प्रेम, जैसा मिला उसी में आनंद का अनुभव, आत्मचिंतन एवं परोपकार ये सब लक्षण मुमुक्षु पुरुष के होते हैं ।
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माबूद मकामे हस्त(ब्रह्मवादी के लक्षण)
यके नूर खूबे खूबां, दीदनी हैरान ।
अजब चीज खुरदनी,पियालए मस्तान ॥१३४॥
जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण बता रहे हैं । वे अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं । श्रेष्ठ ब्रह्म का दर्शन कर वे आश्चर्य में डूब जाते हैं । ब्रह्म रस का पान कर के निरन्तर ब्रह्म भवना में डूबे रहते हैं । यही ब्रह्म साक्षात्कार किये ब्रह्मनिष्ठ के लक्षण हैं ।
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मौजूद खबर(शरीयत - मंजिल)
हैवान आलम गुमराह गाफिल, अब्वल शरीयत पंद ।
हलाल हराम नेकी बदी, दर्से दानिशमंद ॥१३५॥
यवन धर्म में धर्म की चार अवस्था मानी गयी है । उसी का वर्णन कर रहे हैं -
इस संसार में प्रायः सभी प्राणी विषय-विष से मूर्छित होकर भगवन की प्राप्ति के मार्ग को भूलकर नाना योनियोंमें पशु की तरह भटक रहे हैं । अतः विज्ञ परुषों का कर्तव्य है कि ऐसे मार्गभ्रष्ट पुरुषों को, शास्त्र का उपदेश देकर निषिद्ध कर्मों में दोष दिखाते हुए, उन कर्मों से बचाना चाहिए और शरीकत नामक प्रथम अवस्था में उनकी प्रवृत्ति करानी चाहिए । ‘पापों को त्याग कर सत्कर्म का आचरण’ ही शरीकत अवस्था कहलाती है ।
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तरीकत मंजिल
कुल फारिग तर्क दुनिया, हररोज हरदम याद ।
अल्लः आली इश्क आशिक, दरूने फरियाद ॥१३६॥
सब कामनाओं को त्यागकर, प्रति दिन स्थिर मन से श्वास श्वास के साथ हरी नाम स्मरण करते हुए सब से अधिक भगवान का प्रेम पात्र बनने की चेष्टा करनी चाहिए । प्रभु दर्शन के लिए आर्तस्वर से प्रार्थना करनी चाहिए । यह शुद्ध आचरण रूप ‘तरीकत’ अवस्था है ।
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मारफत मंजिल
आब आतश अर्श कुर्सी, सूरते सुबहान ।
शिरर सिफ्त करद बूद, मारफत मकाम ॥१३७॥
पृथ्व्यादि पदार्थों में सर्वत्र परमात्मदर्शन करके ‘सब कुछ ब्रह्म ही है’ - ऐसी भावना करनी चाहिए । परमात्मा की तरह तेजस्वी होकर अपने मन को परमात्मा के गुणगान में स्थिर करना चाहिए । यह अवस्था अध्यात्म अवस्था है । यवन समाज में इसे ‘मारफत’ अवस्था कहते हैं ।
(क्रमशः)

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