शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

= सुन्दरी का अँग(३०-२५/२७) =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*सुन्दरी का अँग*
दादू सुन्दरि देह में, सांई को सेवे । 
राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवे ॥२५॥ 
सँतात्मा - सुन्दरी अपने शरीर के हृदय - देश में ही परमात्मा की भक्ति करती है और अपने प्रभु से अनुरक्त होकर प्रेम - रस का पान करती है । 
दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह । 
दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥२६॥ 
मेरी जीवात्मा - सुन्दरी विषय - वासनादि - मल से रहित होकर, माया - मल रहित परब्रह्म से जा मिली है, अब दोनों निर्मल होने से कामना - मल - रहित प्रेम के अखँड प्रवाह में मिले हुये रहते हैं । 
सांई सुन्दरि सेज पर, सदा एक रस होइ । 
दादू खेले पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥२७॥ 
इति सुन्दरी का अँग समाप्त ॥३०॥ सा - २३४३॥ 
जिस सँत - सुन्दरी की हृदय - शय्या पर परमात्मा सदा एकरस रहते हैं और जो उनसे अभेद रूप खेल खेलती है, उसके समान सौभाग्यवती और कोई भी नहीं हो सकती । इति श्रीदादू गिरार्थ प्रकाशिका सुन्दरी का अँग समाप्त: ॥३०॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें