॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सुन्दरी का अँग*
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दादू सुन्दरि देह में, सांई को सेवे ।
राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवे ॥२५॥
सँतात्मा - सुन्दरी अपने शरीर के हृदय - देश में ही परमात्मा की भक्ति करती है और अपने प्रभु से अनुरक्त होकर प्रेम - रस का पान करती है ।
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दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह ।
दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥२६॥
मेरी जीवात्मा - सुन्दरी विषय - वासनादि - मल से रहित होकर, माया - मल रहित परब्रह्म से जा मिली है, अब दोनों निर्मल होने से कामना - मल - रहित प्रेम के अखँड प्रवाह में मिले हुये रहते हैं ।
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सांई सुन्दरि सेज पर, सदा एक रस होइ ।
दादू खेले पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥२७॥
इति सुन्दरी का अँग समाप्त ॥३०॥ सा - २३४३॥
जिस सँत - सुन्दरी की हृदय - शय्या पर परमात्मा सदा एकरस रहते हैं और जो उनसे अभेद रूप खेल खेलती है, उसके समान सौभाग्यवती और कोई भी नहीं हो सकती । इति श्रीदादू गिरार्थ प्रकाशिका सुन्दरी का अँग समाप्त: ॥३०॥
(क्रमशः)

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