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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(९/१)
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*मोहि, सतगुरु कहि संमुझाया हो ।*
*परम पुरुष बिन और न परसौं,*
*पीव निरंजन राया हो ॥टेक॥*
*सब ऊपरि सोई मेरा स्वांमी,*
*उस परि कोई न बताया हो ।*
*मनसा बाचा और कर्मना,*
*वाही सौं मन लाया हो ॥१॥*
*घट धारी सौं प्रीति न मेरी,*
*जौ अवतार कहाया हो ।*
*वै हम भइया बंध आप मैं,*
*एकहि जननी जाया हो ॥२॥*
मुझे मेरे गुरुदेव ने समझा दिया है कि उन परम पुरुष परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य से मेल जोल नहीं बढ़ाना है; क्योंकि वे ही सर्वोपरि देवता हैं ॥टेक॥
वे ही मेरे सर्वोपरि स्वामी हैं । उन से बढ़कर कोई नहीं है । अतः मैंने मनसा वाचा कर्मणा उसी को अपना रक्षक मान लिया है ॥१॥
मेरा किसी शरीरधारी(आकार) देवता से प्रेम नहीं है, जिसे लोक में ‘अवतार’ कहते हैं, वे तो हमारे परस्पर भाई बन्धु हैं; क्योंकि हम दोनों किसी एक ही शरीरधारी माता से पैदा हुए हैं ॥२॥
(क्रमशः)

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