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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख ।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहैं शेष ॥२४४॥
दादू जैसा निर्गुण राम है, तैसी भक्ति निरंजन जाणि ।
इन दोनों की मित नहीं, संत कहैं परमाणि ॥२४५॥
जैसा पूरा राम है, तैसी पूरण भक्ति समान ।
इन दोनों की मित नहीं, दादू नाहीं आन ॥२४६॥
लिखा है - “नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव, सत्य, परमानन्द, अद्य, परिपूर्ण, परमात्मा ब्रह्म ही मैं राम हैं । भूः भुवः स्वः स्वरूप जो राम है उसको नमस्कार है ।” भक्ति की अगाधता तो निराकाररूपता या निर्गुणरूपता ही है ।
लिखा है - "जो हृत्कमल के मध्य निर्विशेष, इच्छा रहित, हरि हर और ब्रह्मा से ही जानने योग्य तथा योगी जिसका ध्यान करते हैं और जन्ममरणरहित, सच्चिदानन्दस्वरूप, समस्त भुवनो का हेतुभुत जो चैतन्य ब्रह्म है, उसकी मैं पूजा करता हूँ”।
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*सेवा अखंडित*
दादू जब लग राम है, तब लग सेवग होइ ।
अखंडित सेवा एक रस, दादू सेवग सोइ ॥२४७॥
दादू जैसा राम है, तैसी सेवा जाणि ।
पावैगा तब करैगा, दादू सो परमाणि ॥२४८॥
सेवक को तब तक सेवा करते रहना चाहिये जब तक सेव्य-सेवक का अभेद न हो जाय, क्योंकि दोनों(सेव्य-सेवक) की एकता होने पर ही सेवाकार्य पूर्ण माना जाता है ।
श्रुति में लिखा है :: भगवान् के भावों से अपने अन्त:करण को कोमल करके आत्म-कल्याणेच्छु एकान्त में अभेद बुद्धि से आत्मचिन्तन करे ।
भगवान् की शरण में होकर उसी का चिन्तन, कथन, परस्पर सम्भाषण करते हुए अत्यन्त बुद्धिमान् मनुष्य अपना समय यापन करे ।
निर्गुण ब्रह्म में अपना पवित्र मन लगाने से परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है, जहाँ कोई सांसारिक कर्तव्य शेष नहीं रहता ।
आप और मैं एक ही है कोई भेद नहीं है । जो तुम हो, वही मैं हूँ - ऐसा विचार करो । विद्वान् पुरुष तुझमें और मुझ में ज्यादा भेद नहीं देखते ।
विमूढ मनुष्य जीव और ब्रह्म में यत्किञ्चित् भी भेद मानें तो उसको ‘भय’ कहा गया है । द्वैतबुद्धि में भय है - ऐसा श्रुति में लिखा है ।
जो अपने से भिन्न अन्य देवता की उपासना करता है कि यह मेरे से भिन्न है, मैं देवता से भिन्न हूँ, वह देवताओं का पशु है, जैसे लोक में पशु और स्वामी का भेद है । अतः भेदवादी साधक पशुतुल्य है ।
(क्रमशः)

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