गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास ।*
*पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥*
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साभार ~ Rini Bhatnagar 

Osho ~~💝 पंडित कोरे के कोरे रह जाते हैं--गीता कंठस्थ हो जाती है, गीत सुनाई नहीं पड़ता; शब्दों से मस्तिष्क भर जाता है, हृदय भीगता नहीं; दोहरा सकते हैं गीता को, आंख में एक आंसू नहीं उतरता; प्राण में कोई स्वर नहीं बजता; पैर में कोई थिरक नहीं आती; पत्थर की तरह, मुर्दे की भांति, यंत्र की भांति दोहरा देते हैं; भीतर सब अछूता ही रह जाता है; रेखा भी नहीं पड़ती, छाया भी नहीं पड़ती।
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इसलिए शंकर कहते हैं: 'जिसने किंचित भी गीता पढ़ी है...'
इस गीता से कोई श्रीमद् भगवद्गीता का संबंध नहीं है। क्योंकि जिसने किंचित भी कुरान पढ़ा है, वह भी पहुंच जाएगा; जिसने किंचित भी बाइबिल पढ़ी है, वह भी पहुंच जाएगा। और जिसने न बाइबिल पढ़ी है, न कुरान पढ़ा है, न गीता पढ़ी है--किंचित भी जीवन पढ़ा है, वह भी पहुंच जाएगा। जोर है इस बात पर कि जिसने थोड़ी अपनी समझ जगाई है, जिसने जाग कर देखा है; जो सोया-सोया नहीं जीया; जिसने आंखें खोलीं और जीवन को पहचाना है--जरा सा भी।
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जरा सा छोर हाथ में आ जाए, फिर सारा स्वर्ग हाथ में है। एक किरण को भी तुम पकड़ लो, पूरा सूरज तुम्हारे हाथ में है। उसी किरण के सहारे अगर तुम चल पड़ो, तो सूरज कहां जाएगा? तुम अंधेरे घर में बैठे हो, खपड़ों के छेद से जरा सी एक किरण उतर रही है। उस किरण में पूरा सूरज छिपा है। तुम उसके सहारे ही चल पड़ो, तुम सूरज तक पहुंच जाओगे। पूरे सूरज को घर में उतारने की जरूरत भी नहीं है। उतने ज्यादा का करोगे क्या? अपच हो जाएगा।
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तो ध्यान रखना, कहीं ऐसा न हो कि तुम शास्त्र को इकट्ठा करने में लग जाओ। अन्यथा शास्त्र तुम्हारा कारागृह बन जाएगा। उससे तुम्हारे पंख उन्मुक्त न होंगे; न तुम्हारे प्राण नाचेंगे; न तुम स्वाभाविक हो सकोगे।
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शास्त्र के कारण जितने लोग अस्वाभाविक हो जाते हैं, उतने और किसी कारण से नहीं होते। अगर तुम समझ सको तो मैं तुमसे कहना चाहूंगा: शास्त्र के कारण जितने लोग अधार्मिक हो गए हैं, उतने किसी और कारण से नहीं। जितने शास्त्र बढ़ते गए हैं, उतना आदमी अंधा होता गया है; क्योंकि उसे लगता है कि सब समझ तो किताब में रखी है; पढ़ लेंगे किताब और समझ हाथ आ जाएगी।
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काश समझ इतनी सस्ती होती ! तो सारी दुनिया समझदार हो गई होती। गीता घर-घर में है; बाइबिल, कुरान घर-घर में है। क्या कमी है? समझ बिलकुल नहीं है। और शास्त्र जितना उपलब्ध हो जाता है, उतना ही तुम चेष्टा छोड़ देते हो। ध्यान रखना, सिद्धांतों के जंगल में मत भटक जाना।
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भज गोविंदम मूढ़मते👣ओशो

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