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*दादू जड़मति जीव जाणै नहीं,*
*परम स्वाद सुख जाइ ।*
*चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥*
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साभार ~ *प्रभु मंदिर यह देहरी - ओशो*
'सारे धन कमा कर मनुष्य अतिशय भोगों को पाता है, लेकिन सबके त्याग के बिना सुखी नहीं होता।'
अर्जयित्वगिखलानार्थान् भोगानाम्नोति पुष्कलान्।
नहि सर्व परित्यागमतरेण सुखी भवेत॥
दूसरा सूत्र : 'सारे धन कमा कर......।'
खयाल रखना—'सारे धन'। सारे धन का अर्थ हुआ, जिस में भी लगता है, सुख मिलेगा, वह कोई भी हो, वही धन हो गयी। जिसको भी सुख का माध्यम समझते हैं, वही धन है।
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तो कोई मनुष्य रुपये इकट्ठा करता है, कोई मनुष्य डाक टिकटें इकट्ठी करता है। जो रुपये इकट्ठा करता है, वह कहता है, क्या मूढ़ता कर रहे हो, डाक टिकटें इकट्ठी कर रहे हो, होश संभालो ! क्या करोगे इनका? लेकिन उसे उसमें सुख है तो उसके लिए धन हो गया।
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धन का अर्थ ही यही होता है, जिसमें सुख है। कोई आदमी कुछ इकट्ठा करता है, कोई आदमी कुछ। कोई आदमी ज्ञान इकट्ठा करता है, वह उसके लिए धन हो गया। और कोई मनुष्य बिलकुल व्यर्थ की वस्तुएं इकट्ठी करता हो सकता है। व्यर्थ की लगती हैं। अगर उसे उनमें सुख की आशा है तो वह उसके लिए धन हो गया।
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सूत्र कहता है, सारे धन कमा कर —अर्जयित्वा अखिलान् अर्थात—सारे धन इकट्ठे कर लिए, भोगान् आप्नोति पुष्कलान्—और अतिशय भोगों को भी पाता है, लेकिन सबके त्याग के बिना सुखी नहीं होता।
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सांख्य भोग और सुख में फर्क कर रहा है।
अब इसे समझें। साधारणत: तो लोग सोचते हैं : भोग यानी सुख। लेकिन भोग को अगर गौर से देखें तो पाएंगे कि भोग में कभी सुख होता नहीं। भोग में तो एक तनाव है, उत्तेजना है। भोग में तो एक ज्वरग्रस्त दशा है, शांति नहीं। और शांति के बिना सुख कहां ! जो आदमी धन इकट्ठा कर रहा है, वह सोचता है कि इकट्ठा कर लूंगा तो सुख होगा।
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उसका सुख सदा भविष्य में होता है। कभी होता नहीं, वह कितना ही इकट्ठा कर ले, इकट्ठा करने में दुख बहुत होता है, क्योंकि चिंता करनी पड़ती है, बेचैन रहना पड़ता है, नींद खो जाती है, अल्सर पैदा हो जाते हैं, सिरदर्द बना रहता है, रक्तचाप बढ़ जाता है, हृदय के दौरे पड़ने लगते हैं।
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अमरीका में तो कहते हैं कि जिस आदमी को चालीस साल की उम्र तक हृदय का दौरा न पड़े वह असफल आदमी है। सफल आदमी को तो पड़ना ही चाहिए। क्योंकि चालीस साल और सफल आदमी को हृदय का दौरा न पड़े !
भारत मे गांव में ऐसा समझा जाता था कि मारवाड़ी जब एक—दूसरे के यहां विवाह करते हैं तो वे पता लगा लेते हैं कि कितनी बार दिवाला डाला। क्योंकि दिवाले डालने से पता चलता है कि कितना धन होगा। धनी आदमी का लक्षण है, कितनी बार दिवाला डाला। अगर दिवाला नहीं डाला तो हालत खराब है, खस्ता है।
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ठीक ऐसा अमरीका में कुछ दिन में लोग जरूर पूछने लगेंगे कि कितने हार्ट — अटैक हुए? नहीं हुए तो क्या भाड़ झोंकते रहे? करते क्या रहे 2: नाम— धाम, पद—प्रतिष्ठा.. .हार्ट — अटैक तो होना ही चाहिए। रक्तचाप कितना है ? साधारण, तो जिंदगी गंवा रहे हो ! कुछ कमाना नहीं है? यह साधारण रक्तचाप तो आदिम, आदिवासियों का होता है ! और असफल आदमी या भिखमंगे, आवारागर्द लोग, इनको नहीं होते हृदय के दौरे वगैरह।
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चिंतातुर आदमी, जो बड़ी महत्वाकांक्षा से भरा है, उसके पेट में अल्सर तो हो ही जाने चाहिए। घाव तो हो ही जाने चाहिए। क्योंकि चिंता घाव बनाती है; चिंता एसिड की तरह गिरती है पेट में और घाव बनाती है। तो सभी महत्वाकांक्षी अल्सर से तो ग्रस्त होंगे ही।
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तो जो आदमी धन के लिए दौड़ता है, वह सुख तो कभी नहीं पाता। सही, सुख की आशा में दौड़ता है, यह सच है। सुख की आशा में दुख बहुत पाता है। पाता दुख है; सुख की आशा रखता है। और सुख की आशा के कारण सब दुख झेल लेता है। कहता है, कोई हर्जा नहीं; आज अल्सर है, आज हृदय का दौरा पड़ा, आज रक्तचाप बढ़ गया, कोई फिक्र नहीं, कल तो सब ठीक हो जाएगा। कल सब ठीक हो जाएगा; नहीं तो अगले महीने, नहीं तो अगले वर्ष ! कभी न कभी तो सब ठीक हो जाएगा। लोग कहते हैं कि देर हो सकती है, अंधेर थोड़े ही है। कभी न कभी तो प्रभु प्रसन्न होगा। कभी तो हमारे भाव को समझेगा, हमारी चेष्टा को समझेगा; कभी तो पुरस्कार मिलेगा।

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