गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता ।*
*दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥*
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साभार ~ satsangosho.blogspot.com

लोग कहते हैं कि ध्यान तो करें, लेकिन ध्यान से फायदा क्या है? वे सोचते हैं, ध्यान से भी कुछ बैंक—बैलेंस बढ़े। फायदा, लाभ, इससे होगा क्या? उनके जीवन में ऐसा नहीं रह जाता, जो वे स्वांत: सुखाय कर सकें, जो वे कह सकें कि सुख के लिए कर रहे हैं।
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वे पूछते हैं नाचने से फायदा क्या है? अब नाचने से फायदा क्या? पक्षी अगर पूछने लगें, गीत गुनगुनाने से फायदा क्या, तो सारी दुनिया सूनी हो जाये। मगर रोज उठ आते हैं, सूरज के स्वागत में नाचते हैं, गाते हैं, आनंदित हैं, सुखी हैं। धन बिलकुल नहीं है पक्षियों के पास, लेकिन सुख है। वृक्ष फूले चले जाते हैं। कोई वृक्ष पूछता ही नहीं। अभी तक कोई अर्थशास्त्री वृक्षों में पैदा ही नहीं हुआ, जो उनको समझाये कि क्यों रे नासमझो, व्यर्थ फूले चले जा रहे हो, फायदा क्या?
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एक बार वृक्षों को कोई यह खयाल डाल दे उनके दिमाग में कि फायदा कुछ भी नहीं है फूलने से, फायदा क्या है, तो वृक्ष फूलने बंद हो जाएं। चांद—तारे रुक जायें—फायदा क्या? सूरज ठहर जाये—यह रोशनी बरसाने से फायदा क्या है?
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यह सारा जगत अर्थशास्त्रियों की बिना सलाह के चल रहा है, सिर्फ मनुष्य को छोड़ कर। और मनुष्य अर्थशास्त्रियों की सलाह के कारण बड़े अनर्थ में पड़ गया है। उसके जीवन से सारा अर्थ खो गया है। बस एक ही बात वह पूछता है : फायदा?
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स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा। 
किसी ने पूछा तुलसी को : क्यों गायी तुमने राम की कथा? तो कहा : स्वांत: सुखाय। कुछ पाने के लिए नहीं; कुछ राम को रिझाने के लिए भी नहीं। वे तो रीझे ही हुए हैं। कोई रिश्वत भी नहीं दी उनको कि तुम्हारी स्तुति गायेंगे तो जरा मुझे स्वर्ग में अच्छी, ठीक—सी जगह दे देना। नहीं, किसीलिए नहीं। 
गाने में मजा आया; स्वांत: सुखाय, सुख आया।
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खयाल करें, जब भी कोई कार्य बिना कुछ पाने की आकांक्षा के करते हैं, तभी सुख आता है। और जहां भी कुछ पाने की आकांक्षा है, वहीं दुख है, वहीं तनाव है। धन से तो सुख मिल नहीं सकता, क्योंकि धन का मतलब ही यह है कि धन साधन है और सुख बाद में आएगा। रुपया हाथ में रखने से तो सुख किसी को भी आता नहीं। कितने ही रुपये के ढेर लग जायें तो भी सुख नहीं आता, सुख मिलेगा धन के इकट्ठे होने से, पहले हम धन इकट्ठा कर लें, फिर सुख मिलेगा—ऐसे लोग तैयारियां ही करते रहते हैं और तीर्थयात्रा पर कभी नहीं निकलते। टाइम—टेबिल ही देखते रहते हैं कि जाना है; जाते नहीं। क्योंकि तैयारी ही कभी पूरी नहीं हो पाती तो जायें कैसे?

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