गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

= *आसै आसण का अंग ६४(१७/२०)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐 
*जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।*
*भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४*
भवहि भूत१ विभूति२ ह्वै, भाव भूत भगवान । 
रज्जब समझी जीव गति, आसै३ आसण४ जान ॥१७॥ 
भाव से ही प्राणी१ माया२ हो जाता है और भाव से ही भगवान हो जाता है, और जीव की गति हमने समझ ली है, इसका जिसमें प्रेम३ होता है वहाँ ही इसका निवास४ होता है । 
हरि हरिसिद्धि१ होत जिव२, मेला हित३ चित माग४ । 
उभय एक संदेह बिन, रज्जब जासौं राग ॥१८॥ 
चित्त के प्रेम३रूप मार्ग४ से मिल कर जीव२ हरि और माया१ रूप हो जाता है, जीव, माया और ब्रह्म इन दोनों में से एक को जिसमें प्रेम होता है उसे संशय रहित प्राप्त करता है । 
इत विभूति१ अनभूत२ उत, भूत३ भाव बिच भेद४ । 
रज्जब मेला आश दिशि, नीके किया न खेद ॥१९॥ 
इधर संसार में तो माया१ है, उधर संसार से परे भूतों से रहित ब्रह्म२ है, बीच में प्राणी३ का भाव है वह रहस्यमय४ साधन है, जिसमें प्राणी का वासनामय भाव होता है उसी से क्लेश रहित भली प्रकार मिलता है । 
ब्रह्माण्ड पिंड वाणी विविध, उदय अस्त ह्वै नाश । 
रज्जब रहसी प्राण पहिं१, भाव भेद संग दास ॥२०॥ 
ब्रह्माण्ड के शरीरों के भाव भेद के अनुसार विविध प्रकार की वाणी प्रकट होती है, अस्त होती है और नाश हो जाती है, प्राणी के पास१ वही दास के समान संग रहती है जिसमें उसका भाव होता है । 
(क्रमशः)

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