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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(८/१)
*देषहु साह रमइया ऐसा,*
*सो रहै अपरछन बैसा ॥टेक॥*
*यहु हाट कियौ संसारा,*
*तामैं बिबिधि भांति ब्यौपारा ।*
*सब जीव सौदागर आया,*
*जिनि बनज्या तैसा पाया ॥१॥*
*किनहूं बनिजी षलि षारी,*
*किनहुं लइ लौंग सुपारी ।*
*किनहूं लिये मूंगा मोती,*
*किनहूं लइ काच की पोती ॥२॥*
ऐसे राम व्यापारी से साक्षात्कार करना चाहिये ॥टेक॥
यह संसार एक प्रकार की दुकान ही है । इसमें नाना प्रकार के व्यापार होते हैं । सभी प्राणी यहाँ अपनी अभीष्ट वस्तु खरीदने आते हैं । जिन ने जैसा मूल्य दिया उतने मूल्य की वस्तु उन ने प्राप्त की ॥१॥
किसी ने खाद एवं खल ख़रीदा तो किसी ने लौंग एवं सुपारी खरीदी । किसी ने मूंगा एवं मोती आदि रत्न ही खरीदे और किसी ने मुंह देखने के लिये शीशा(दर्पण) खरीदा ॥२॥
(क्रमशः)

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