बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २३५/२३९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाहीन ।
दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥२३५॥
वे देहाध्यास को त्यागकर सांसारिक विषयों से दूर रहते हुए अपने हृदयाकाश में प्रभु को खोजते रहते हैं । ऐसे पुरुष संसार में बहुत थोड़े होते हैं । ऐसे साधुजन दर्शनयोग्य होते हैं ।
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रस(प्रेम प्याला)
प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया ।
दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥२३६॥
आनंद रस से परिप्लुत प्रेमभक्ति का अमृतपान कराकर, मुझे ह्रदय में ही दर्शन दे कर, उस प्रभु ने मुझ पर महान अनुग्रह किया है ।
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इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया ।
दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥२३७॥
ब्रह्मवेत्ता भी स्वभावसिद्ध, सतत, अव्यवहित, दूसरी वृत्तियों के बिना प्रत्यगभिन्न परमात्मा से अखंडाकारवृत्तिमय भक्ति, जो बिना किसी हेतु के होती है, को प्रभुकृपा से ही प्राप्त करते हैं । उसे प्राप्तकर विरहजन्य पीड़ा का अनुभव करते हुये भक्तिरस का यथेच्छ पान करते हैं । लिखा है -
गोविन्द भगवान की एकान्तिक भक्ति वही है जब भक्त सर्वत्र उसी को देखे । यह निर्गुण भक्ति है, जो बिना कारण और व्यवधानरहित होती है ।
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दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया ।
जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥२३८॥
जब स्वयं भगवन ने मुझको अष्टदलकमल में दर्शन दिया तभी से मेरा मन भगवदाश्रित होकर उनके दर्शन से उद्भूत आनंद से कृतकृत्य हो गया ।
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दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न ।
अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥२३९॥
प्रेमी भक्त स्वहृदयाकाश में ब्रह्म का प्रेम रस पी पीकर दिनरात भगवान के मुखकमल का दर्शन करते करते मंगलमय जीवन बिताते हैं ।
(क्रमशः)

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