बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

= निगुणा का अँग(३३ - १९/२१) =

#daduji


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*निगुणा का अँग ३३*
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सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने एक । 
दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥१९॥ 
सुगुण युक्त कृतज्ञ अपने पर किये उपकार को बहुत बढ़ाकर मानता है किन्तु सुगुण रहित कृतघ्न के कितने ही उपकार करो तो भी वह एक नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - कृतघ्न को अनेक नरक प्राप्त होते हैं अर्थात् वह अनेक वर्षों तक नरक में रहता है । 
सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखे१ ढाहि२ । 
दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥२०॥ 
सुगुण सँपन्न मानव चाहे कितने ही उपकार करे, किन्तु कृतघ्न तो उन सब के अहसास को मिटाकर२ रख१ देता है, लेश भी नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं कि कृघ्न ज्ञान - फल प्राप्त किये बिना ही मर जाता है ।
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सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने कोइ ।
दादू साधू सब कहैं, भला कहां तैं होइ ॥२१॥
सुगुण सँपन्न पुरुष अनेक उपकार करता है किन्तु कृतघ्न किसी एक को भी नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - "कृतघ्न का भला किस प्रकार से हो सकता है ?" 
(क्रमशः)

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