शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २१६/२१७


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
परिचय जिज्ञासु उपदेश
कहै सब ठौर, गहै सब ठौर, रहे सब ठौर, ज्योति प्रवानै ।
नैन सब ठौर, बैन सब ठौर, ऐन सब ठौर, सोई भल जानै ।
शीश सब ठौर, श्रवण सब ठौर, चरण सब ठौर, कोई यहु मानै ।
अंग सब ठौर, संग सब ठौर, सबै सब ठौर, दादू ध्यानै ॥२१६॥
वेद और शास्त्र उस ब्रह्म को सर्वव्यापक बताते हैं । श्रुति में लिखा है; “वह देव एक ही है जो सर्वत्र व्याप्त है । सभी भूतों में निगूढ़(छिपा हुआ) सब भूतों की अंतरात्मा है । सबके कर्मों को वह साक्षीरूप से देखता है । सब के कर्मों का फल दाता होने के कारण वह ‘अध्यक्ष’ है । वह सब भूतों में रहने वाला, चेतन रूप केवल निर्गुण है ।”
अतः वह सदा सर्वत्र भक्तों द्वारा उपहृत आहार को सादर ग्रहण करता है तथा वह प्रकाशरूप से सर्वत्र स्थित है । उसके हाथ-पैर आदि अंग सब तरफ हैं । ऐसा ज्ञान(चराचर में) सभी को नहीं होता, किंतु कुछ ही ज्ञानी उसे इस रूप में जान कर उसकी उपासना करते हैं । श्री दादू जी महाराज कहते हैं कि मैं तो उसको ध्यानमुद्रा द्वारा सर्वत्र देखता हूं ।
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तेज ही कहणा, तेज ही गहणा, तेज ही रहणा सारे ।
तेज ही बैना, तेज ही नैना, तेज ही ऐन हमारे ।
तेज ही मेला, तेज ही खेला, तेज अकेला, तेज ही तेज सँवारे ।
तेज ही लेवै, तेज ही देवै, तेज ही खेवै, तेज ही दादू तारे ॥२१७॥
ज्योतिर्मय ब्रह्म के ध्यान से मेरी दृष्टि ज्योतिर्मय हो गयी है । अतः सर्वत्र मुझे ज्योतिर्मय ब्रह्म ही दिखाई देता है । मैं उसी का कथन, उसी की धारणा करता हूं । मेरा मन वहीं निवास करता है । वाणी से उसी की स्तुति, नेत्रों से उसी का दर्शन, हृदय से उसी का चिंतन करता रहता हूं । उसी से मेरा मिलन हो रहा है । उसी को ग्रहण करता हूं । वही मेरा कर्णधार है । वही मुझे भवसागर को पार उतारने वाला है ।
विवेक चूड़ामणि में लिखा है कि; “जो बाहर-भीतर ज्योति : स्वरूप पर से परे प्रत्यगज्योति है, जो स्वयं ज्योति है, वह मैं शिव स्वरूप हूं । यति(योगी) भृकुटी के मध्य में ज्योतिर्लिंग का ध्यान करता है ।" उसके लिए वह तारक योग है ।
योग शास्त्र में लिखा है :: दोनों ध्रुवों के मध्य में सच्चिदानंद कूटस्थ तेजोमय ब्रह्म का ध्यान ही तारकयोग है । इस योग से योगी संसार को पार कर जाता है ।
(क्रमशः)

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