#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निगुणा का अँग ३३*
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दादू दूध पिलाइये, विषहरि१ विष कर लेइ ।
गुण का अवगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥१३॥
जैसे सर्प१ को दूध पिलाने पर वह दूध उसमें विष बनकर उसी को जलाता है, वैसे ही कृतघ्न को उपदेश देने पर वह गुण रूप उपदेश भी उसमें दूसरों को जाल में फंसाने का साधन बनकर पाप द्वारा उसे दु:ख ही देता है ।
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*अज्ञ स्वभाव अपलट*
बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल माँहिं ।
दादू सूखे सींचतां, तो जल को दूषण नाँहिं ॥१४॥
अज्ञानी कृतघ्न का स्वभाव नहीं बदलता, यह कह रहे हैं - जैसे जवासा बादल द्वारा जल सींचते रहने पर भी बिना अग्नि ही सूख कर जल मरता है, तब जल को क्या दोष है ? वैसे ही सँतों के द्वारा सुन्दर उपदेश देते रहने पर भी कृघ्न पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह दुष्कर्म करने के अपने स्वभाव से ही दुखी हो, तब उपदेश को क्या दोष है ?
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*सगुणा, निगुणा कृतघ्नी*
सुफल वृक्ष परमार्थी,सुख देवे फल फूल ।
दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटे मूल ॥१५॥
१५ - २८ में सुगुणी कृतज्ञ और दूर्गुणी कृतघ्न सम्बन्धी विचार कह रहे हैं - ज्ञान, भक्ति आदि सुन्दर फल - छूलों वाला परमार्थी सँत - वृक्ष ज्ञान - भक्ति आदि फल - फूल प्रदान करके सभी को सुख ही देता है, किन्तु कृतघ्न उसी पर बैठकर अर्थात् सँत - वृक्ष के आश्रय निर्वाह करता हुआ भी निन्दादि - कुल्हाड़े से उन्हीं की जड़ काटता है और उससे होने वाली अपनी हानि को नहीं समझता ।
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*सगुणा, निगुणा कृतघ्नी*
सुफल वृक्ष परमार्थी,सुख देवे फल फूल ।
दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटे मूल ॥१५॥
१५ - २८ में सुगुणी कृतज्ञ और दूर्गुणी कृतघ्न सम्बन्धी विचार कह रहे हैं - ज्ञान, भक्ति आदि सुन्दर फल - छूलों वाला परमार्थी सँत - वृक्ष ज्ञान - भक्ति आदि फल - फूल प्रदान करके सभी को सुख ही देता है, किन्तु कृतघ्न उसी पर बैठकर अर्थात् सँत - वृक्ष के आश्रय निर्वाह करता हुआ भी निन्दादि - कुल्हाड़े से उन्हीं की जड़ काटता है और उससे होने वाली अपनी हानि को नहीं समझता ।
(क्रमशः)

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