मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

= निगुणा का अँग(३३ - १६/१८) =

#daduji


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*निगुणा का अँग ३३*
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दादू सगुणा गुण करे, निगुणा माने नाँहिं ।
निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब माँहिं ॥१६॥
सुन्दर गुण वाले सँत तो सभी का उपकार ही करते हैं किन्तु गुण रहित कृतघ्न उनके उपकार रूप गुण को नहीं मानता । अत: वह ज्ञान - फल के प्राप्त हुये बिना ही मर कर अन्य शरीर को धारण करने जाता है और ज्ञान - भक्ति आदि सुन्दर गुणों से युक्त सँत ब्रह्म में लय होता है ।
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निगुणा गुण माने नहीं, कोटि करे जे कोइ । 
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥१७॥ 
गुण न मानने वाले कृतघ्न के प्रति कोटि उपकार भी करें, तो भी वह गुण नहीं मानता । यदि उसे अपना सब कुछ भी समर्पण कर दें, तो भी वह आगे शत्रु ही बन जायेगा । 
दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार । 
सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥१८॥ 
सुन्दर गुण युक्त कृतज्ञ को ही मित्र रूप से ग्रहण करना चाहिए और गुण न मानने वाले कृतघ्न को त्याग देना चाहिए । सुगुण युक्त कृतज्ञ को अपने पास सन्मुख ही रखना चाहिए और गुण न मानने वाले कृतघ्न से प्रेम हो, तो उससे प्रेम हटा लेना चाहिए ।
(क्रमशः)

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