🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू कर्त्ता हम नहीं, कर्त्ता औरै कोइ ।*
*कर्त्ता है सो करेगा, तूं जनि कर्त्ता होइ ॥*
==========================
साभार ~ oshoganga.blogspot.com
*कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका !*
खयाल करें, जो भी धन इकट्ठा करते हैं, इसीलिए इकट्ठा करते हो कि सोचते हैं कि इकट्ठा कर सकते हैं ...
.
जो है वह मिला है, उसे इकट्ठा करने की जरूरत ही नहीं है। परमात्मा मिला ही हुआ है; उसे अर्जित नहीं करना है। वह मनुष्य मात्र का स्वभाव है। सच्चिदानंद मनुष्य है। लेकिन मनुष्य सोचता है, अर्जित करना होगा, कमाई करनी होगी, सुख के लिए इंतजाम करना होगा, तो मनुष्य कर्ता बन जाता है। वह कहता है, ऐसा करूंगा, ऐसा करूंगा, इतना—इतना कर लूंगा—फिर कर्ता बना कि जला।
.
यह वचन पढ़ें, 'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका।'
जो कर्ता के कारण ही दग्ध हुआ जा रहा है कि मुझे करना है। यह इतना विराट विश्व चल रहा है; कभी आंख खोल कर नहीं देखते कि कोई कर्ता नहीं दिखाई पड़ता और सब हो रहा है ! देखें खेत में लगे फूलों को। लिली के ये छोटे—छोटे फूल न तो श्रम करते हैं, न अर्जन करते हैं, फिर भी कैसे सुंदर हैं ! कैसे मनमोहक ! सम्राट भी अपनी सारी साज—सज्जा में इतना सुंदर न दिखेगा। क्या अर्थ हुआ इसका ?
.
इसका अर्थ हुआ, जरा गौर से देखें, इतना विराट अस्तित्व चला जा रहा है, चल रहा है। तो जो इस विराट को चला रहा है, वही मुझे भी चला लेगा। ऐसा भाव जिसे आ गया, नमस्कार हो गया। ऐसा भाव जिसे आ गया, उसने अपनी सीमा छोड़ दी; असीम के साथ गठबंधन बांध लिया। उसने कहा : कर्ता है परमेश्वर, मैं कर्ता नहीं। उसने अपने मैं का जो केंद्र था, उसे विसर्जित कर दिया।
उसने कहा : तूने ही पैदा किया; तू ही श्वास ले रहा है, तू ही भोजन पचाता है; तू ही भोजन को खून बनाता है; तू ही जवान करता है; तू ही बूढ़ा करता है; एक दिन तू ही उठा ले जाएगा। जब सभी तू कर रहा है तो बीच में कर्ता क्यों बनें, तू सब कर ! हम सिर्फ होने देंगे। हम कर्ता न रहेंगे। हम केवल उपकरण हो जाएंगे—निमित्त मात्र। तेरी धारा हमसे बहे; जैसे बांसुरीवादक की धारा बहती है बांस की पोगरी से। बांस की पोंगरी सिर्फ खाली स्थान है जहां से स्वर बह सकते हैं। हम बांस की पोगरी होंगे।
.
कबीर ने कहा है यही कि मैं बांस की पोंगरी हूं। वो गाये तो गीत बहे; वो न गाये तो गीत चुप रहे। मैं न गाऊंगा। मैं न गुनगुनाऊंगा। मैं बीच में न आऊंगा। ऐसी जो भावदशा है, वही नमस्कार है, वही नमन है। वही समर्पण है। कहें श्रद्धा, कहें प्रार्थना, भक्ति, आस्तिकता, जो भी कहना हो। लेकिन सार—सूत्र की बात इतनी है कि कर्ता परमात्मा है, हम कर्ता नहीं हैं।
.
'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य से जला है जिसका अंतर्मन, ऐसे पुरुष को शांतिरूपी अमृतधारा की वर्षा के बिना सुख कहां है?' नहीं, मनुष्य के द्वारा सुख न कमाया जा सकेगा। शांतिरूपी वर्षा मनुष्य के ऊपर बरसे, कमाई नहीं जा सकती है शांति। मनुष्य केवल द्वार दे दे और प्रभु बरसे, मनुष्य के भीतर भर जाये।
.
देखें, वर्षा होती है पहाड़ पर, पहाड़ खाली का खाली रह जाता है, क्योंकि पहले से ही भरा है। फिर वही वर्षा नीचे आती है, गड्डों में भर जाती है और झीलें बन जाती हैं, मानसरोवर निर्मित हो जाते हैं। क्यों? झील भर जाती है, क्योंकि झील खाली थी। जो खाली है वह भर जाएगा; जो भरा है वह खाली रह जाएगा।
.
तो अगर अपने अहंकार से बहुत भरे हैं कि मैं कर्ता, मैं कर्ता, मैं धर्ता, मैं यह, मैं वह, अगर भीतर ये सब भरा है, तो खाली रह जाएंगे। परमात्मा बरसता है, लेकिन झील न बन पाएंगे। खाली हो तो उसकी अमृतधारा से भर जाएं। और तभी है शांति।
कुत: प्रशमपीयूषधारा सारमृते सुखम्।
*उसकी अमृतधारा की वर्षा के बिना किसको शांति मिलती है ! शांति करने का परिणाम नहीं है; अकर्ता हो जाने की सहज दशा है।*

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें