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*दादू जा कारण जग ढूंढिया, सो तो घट ही मांहि ।*
*मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
कभी—कभी देखा न कि मनुष्य चश्मा लगाये रहता है और चश्मे को खोजता है ! चश्मा ही लगाये है और चश्मे को खोजता है। जल्दी में ट्रेन पकड़नी, कि बस पकड़नी, कि कुछ काम आ गया है तो भूल जाता है एकदम। देखा कि आदमी कान पर पेंसिल खोंसे रहता और सारी टेबल खोज डालता है। ऐसी ही कुछ भूल हो गयी है। बस ऐसी ही भूल हो गयी है।
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भीतर पड़ा है और यहां—वहां खोज रहे हैं। फिर जब नहीं मिलता यहां—वहां तो बेचैनी बढ़ती है। बेचैनी में और भूल होती है। फिर जब बिलकुल नहीं मिलता, कितना ही दौड़ते हैं, मीलों की यात्रा करते हैं, जन्मों —जन्मों की यात्रा और नहीं मिलता, तो बहुत घबड़ा जाते हैं। उस घबड़ाहट में और होश खो जाता है।
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जरा बैठें, ध्यान का इतना ही अर्थ है; जरा बैठें। दौड़े नहीं, खोजें भी नहीं; जरा शांत होकर बैठ जाएं। शायद जो तल में पड़ा है, वह प्रगट हो जाये। शायद शांत अवस्था में अपने स्वभाव का स्मरण हो जाये। बस इससे ज्यादा गुरु और क्या कर सकता है? खोया नहीं है किसी को। जिसे खोज रहे हैं, वह स्वयं ही हैं। तत्वमसि श्वेतकेतु।
‘मोह मात्र के निवृत्त होने पर और अपने स्वरूप के ग्रहण मात्र से वीतशोक और निरावृत्त दृष्टिवाले पुरुष शोभायमान होते हैं।’
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व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रत:।
वीतशोका विराजते निरावरण दृष्टय:।।
जिसका यह सपनों में मोह छूट गया। जिसने ये मन में उठती रागात्मक वृत्तियों को जाग कर देख लिया और इनका विचार छोड़ दिया और जो चीजों को सीधा—सीधा देखने लगा।
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व्यामगेहमात्रविरतौ...।
मोहमात्र जिसका निवृत्त हुआ। जो अब ऐसा नहीं कहता है कि यह मेरा है और यह मेरा नहीं है। क्या मेरा है, और क्या तेरा है?
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व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रत:।
जिसने अपने स्वरूप को ग्रहण कर लिया। शब्द का अर्थ समझें।
स्वरूप को पाना थोड़े ही है—है ही। लेकिन भूल गये हैं। भूल को सुधार लिया। दो और दो पांच जोड़ रहे थे, दो और दो चार जोड़ लिये। दो और दो चार ही थे। जब पांच जोड़ते थे तब भी चार ही थे।पचास जोड़ो तो भी चार ही रहेंगे। कुछ भी जोड़ें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। न भी जोड़ें तो भी दो और दो चार ही हैं।
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स्वरूपादानमात्रत:।
और जिसने अब अपने स्वरूप को अंगीकार कर लिया; जो था उसे स्वीकार कर लिया, जो था उसकी स्मृति से भर गया।
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वीतशोका विराजते निरावरण दृष्टय:।
वह सारे दुख के पार हो जाता है। और एक ऐसे सिंहासन पर विराजमान हो जाता है जहां निर्मल दृष्टि है; जहां सब निर्मल है, निर्विकार है। ऐसी निर्विकार दृष्टि वाला व्यक्ति ही शोभायमान है। इस देश में ऐसे व्यक्ति की ही महिमा गायी है। धन की नहीं, पद की नहीं, सम्राटों की नहीं, साम्राज्यों की नहीं। भारतीय मनीषा एक ही साम्राज्य पर भरोसा करती हैं, वह है भीतर का, स्वभाव का स्वच्छंद, स्वयं के गीत का। ऐसा ही व्यक्ति केवल शोभायमान है।
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वीतशोका विराजते निरावरणदृष्टय:।
जिसकी दृष्टि निरावरण हो गयी। जिसकी आंख पर कोई परदा न रहा, कोई आवरण न रहा। जो देखने लगा सीधा—सीधा। जिसकी देखने की कोई आकांक्षा न रही कि ऐसा देखूं कि ऐसा हो, जो सीधा—सीधा देखने लगा। ऐसी निरावरण दृष्टि को उपलब्ध व्यक्ति ही एकमात्र जगत में शोभायमान है।

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