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卐 सत्यराम सा 卐
*जागत जहँ जहँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ ।*
*दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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मैलों मैले मिल रसरंगा१,
मैले उज्जवल बने न संगा ।
कन्ह२ गाय के कनै३ न आवै,
पशुहु पेख माँहिली पावै ॥४१॥
मलीनों से मलीन मिलते हैं तब ही उनकी प्रेम-क्रीड़ा१ होती है, मैलों का और उज्जवलों का संग नहीं बनता, देखो, पशु भी भीतर की भावना को जान लेते हैं, ब्रह्मचारिणी२ गाय के पास३ साँड नहीं जाता । वैसे प्राणी जहाँ वासनापूर्ण हो वहाँ ही जाता है ।
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वक्त्र१ बार२ ह्वै नीकसै, पैठे श्रवण सु द्वार ।
रज्जब मिलिये हि सगों से, बाकी फिर हुँ हजार ॥४२॥
वचन मुख१ द्वार२ से निकलते हैं और श्रवण द्वार से प्रवेश करते हैं और अपने सम्बन्धी शब्दों से मिलते हैं शेष चाहे हजार शब्दों की ध्वनि होती रहे उससे नहीं मिलते, वैसे ही प्राणी प्रेम के सम्बन्ध से ही मिलते हैं ।
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तीरथ प्रीति सु मीन ह्वै, मूरति कीट पषान ।
हेतु हुताशन समंद१ जीव२, आसै३ आसण जान ॥४३॥
प्राणी की तीर्थ में प्रीति होती है तो मच्छी बनता है, पत्थर की मूर्ति प्रीति होती है तो पत्थर का कीट बनता है, अग्नि में प्रीति होती है तो अग्नि१ कीट२ बनता है, इसी प्रकार जिसमें प्रीति३ होती है उसी में निवास होता है ।
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बगला हुदहुदमोर१ तन, साका२ शुक्ल सु स्वाँग३ ।
रज्जब पाई प्राणि ने, मन वच कर्म जो माँग ॥४४॥
जिसकी श्वेत भेष३ में इच्छा२ रहती है, वे बक, मुर्ग-सुलेमान१(राज मुकुट) का शरीर पाते हैं, मन, वचन, कर्म से जो भी प्राणी की माँग रही है वही उसने प्राप्त की है ।
(क्रमशः)

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