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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(५/२)
*इडा पिंगला उलटी आई, सुषमन ब्रह्मण्ड चढाई ।*
*जब मूल चापि दिढ बैठा, तब बिंद गगन मैं पैठा ॥३॥*
*जहां शब्द अनाहद बाजै, तहां अन्तर जोति बिराजै ।*
*कोई देषै देषनहारा, सो सुन्दर गुरू हमारा ॥४॥*
इडा एवं पिंगला नाडियों का चलन भी विपरीत हो गया है । सुषुम्ना नाडी भी ब्रह्माण्ड में पहुँच कर स्थिर हो गयी है । जब सभी इन्द्रियाँ दृढतया निग्रहीत हो गयी तो ब्रह्म बिन्दु भी मस्तक में स्थिर हो गया है ॥३॥ अब वहाँ उसे निरन्तर ब्रह्मनाद सुनायी देता है । अन्तर्ज्योति से वह सतत प्रकाशमान है । कोई सिद्ध साधक ही इस अलौकिक स्थिति को प्रत्यक्ष कर सकता है । महाराज श्रीसुन्दरदास कहते हैं – ऐसा सिद्ध गुरु(श्रीदादूदयाल) ही हमारा गुरु होने का अधिकारी है ॥४॥
(क्रमशः)

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