गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै ।*
*अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३१)
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

याददाश्त लौटानी है। याददाश्त कराई जा सकती है, मुक्त कोई कैसे कर सकता है? जंजीरें हैं ही नहीं, जंजीरें मान रखी हैं। मान्यता की जंजीरें हैं। झकझोरा जा सकता है कि हाथ पर जंजीर नहीं है; खयाल है जंजीर का। आंख खोल कर कभी गौर से देखा ही नहीं कि हाथ पर जंजीरें नहीं हैं, पैर में बेड़ियां नहीं हैं, मुक्त हैं। मुक्त होना स्वभाव है, संपदा है।

मुक्ति कोई वस्तु नहीं कि अर्जित करनी है, कि जिसका अभ्यास करना है—मुक्ति स्वभाव है। मुक्त मनुष्य पैदा ही हुए है। मुक्त ही जी रहा है। मुक्त ही मरेगा। बीच में बंधन का एक स्वप्न देखा।
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ऐसा समझें कि एक रात सोये और सपना देखा कि पकड़ लिये गये, तस्करी में पकड़ लिये गये, मीसा के अंतर्गत जेल में बंद कर दिये गये, हथकड़ियां डाल दी गयीं।
अब बड़े घबराने लगे रात नींद में कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा, कैसे बाहर निकलेंगे? और सुबह नींद खुली तो हंसने लगे। क्या सुबह यह कहेंगे कि रात जब जेलखाने में पड़े थे, हथकड़ियां लग गयी थीं, तब सच में ही जेलखाने में पड़ गये थे? नहीं, सुबह तो यह कहेंगे सच में तो मैं अपने बिस्तर पर आराम कर रहा था, झूठ में जेलखाने में कैद हो गया था।
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लेकिन बिस्तर पर आराम कर रहे थे, ये याद नहीं रह गया। इस कारण सपना बहुत भारी, हावी हो गया। आंखें सपने से बोझिल हो गयीं। सपने के द्वारा ग्रसित हो गये। सपने ने सम्मोहित कर लिया। सपना ऐसा था कि भूल ही गये कि यह सपना है। सपने में जकड़ गये। रात भर तकलीफ पायी। लेकिन सुबह उठ कर यह तो मानेंगे कि तकलीफ हुई नहीं थी वस्तुत:, मानी हुई थी।
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मुक्त ही पैदा हुए हैं, मुक्त अभी हैं, इस क्षण ! सपना देख रहे हैं—वह सपना है और अगर सपने में खोये हैं—सपना धोखा देता होगा।

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