#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निगुणा का अँग ३३*
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*अज्ञ स्वभाव अपलट*
सद्गुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवँग ।
दादू विष छाड़ै नहीं, कहा करै सत्संग ॥४॥
४ - १० में कहते हैं - अज्ञानी कृतघ्न का स्वभाव नहीं बदलता, जैसे सर्प विष - शाँति के लिए बावने चन्दन पर लिपटे तो रहते हैं किन्तु अपने दोष विष को नहीं छोड़ते, वैसे ही अज्ञानी कृतघ्नी प्राणी सँतों के पास तो रहते हैं किन्तु अपने दोषों को नहीं छोड़ते । तब सत्संग उनका क्या भला करेगा ?
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*अज्ञ स्वभाव अपलट*
सद्गुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवँग ।
दादू विष छाड़ै नहीं, कहा करै सत्संग ॥४॥
४ - १० में कहते हैं - अज्ञानी कृतघ्न का स्वभाव नहीं बदलता, जैसे सर्प विष - शाँति के लिए बावने चन्दन पर लिपटे तो रहते हैं किन्तु अपने दोष विष को नहीं छोड़ते, वैसे ही अज्ञानी कृतघ्नी प्राणी सँतों के पास तो रहते हैं किन्तु अपने दोषों को नहीं छोड़ते । तब सत्संग उनका क्या भला करेगा ?
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दादू कीड़ा नरक१ का, राख्या चन्दन माँहिं ।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नाँहिं ॥५॥
जैसे मल१ कीट को चन्दन में रख दें तो उसे चँदन अच्छा नहीं लगता, वह पुन: लौटकर मल में ही जायेगा । वैसे ही अज्ञानी कृतघ्नी को भक्ति ज्ञानादि अच्छे नहीं लगते, उनका उपदेश करने पर भी उन्हें छोड़ कर विषयों में ही जायगा ।
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सद्गुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ ।
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥६॥
सद्गुरु तो अच्छे ज्ञानी और श्रेष्ठ स्वभाव के हैं किन्तु शिष्य का कृतघ्नता - दोष रूप गुण हृदय से नहीं दूर होता । वह ज्ञानामृत को छोड़कर विषय रूप महा - विष ही खाता है । अत: अज्ञानी कृतघ्नी का स्वभाव नहीं बदलता ।
(क्रमशः)

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