बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २०७/२११


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
जो कबहूँ समझे आतमा, तो दृढ़ गहि राखे मूल ।
दादू सेझा राम रस, अमृत काया कूल ॥२०७॥
जब यह मन संसारभावना से भावित होता है । तो यह जीवभाव को प्राप्त हो जाता है । अनादिकाल से प्रवृत्त इस भावना से - “यह मेरा धर्म, यह अधर्म, ‘यह मेरा शरीर है ।’ वे मेरे पिता-पुत्र, ये मेरे पशु हैं” देखता है । कदाचित् पुण्योदय होने से वह, तत्त्वज्ञ गुरु से “तू धर्म-अधर्म से पैदा होने वाला शरीर नहीं हैं, किन्तु तू तो वह ब्रह्म है” - इस प्रकार बोध कराने पर अपने को जान लेता है । प्रपञ्च के निवृत्त होने पर निर्विकार, निष्प्रपञ्च, अद्वैत, शिव, निरजंन, निजरूप को जानकर सुखी होता है । इस ज्ञान को दृढ करने के लिये अपने मन को विषयों से हटाकर अपनी आत्मा में लीन करना चाहिये अन्यथा, विषयों की प्रबलता से, उत्पन्न ज्ञान भी नष्ट हो जायेगा । जब ज्ञान दृढ़ हो जाता है, तब भगवान् का प्रेमरस उत्पन्न होता है और साधक अपने हृदय सरोवर को उस प्रेम से भरकर अद्वैत-अमृत रूपी ब्रह्मानन्द को पीकर अमर हो जाता है ।
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परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू मुझ ही मांहै मैं रहूँ, मैं मेरा घर बार ।
मुझ ही माहै मैं बसूँ, आप कहै करतार ॥२०८॥
दादू मैं ही मेरा अर्श में, मैं ही मेरा थान ।
मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहिमान ॥२०९॥
दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।
मेरे तकिये मैं रहूँ, कहते सिरजनहार ॥२१०॥
दादू-मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग ।
मैं ही मेरा जीव में, आप कहै परसंग ॥२११॥
जिज्ञासु शिष्य गुरु से पूछता है - हे दयालो ! गुरुदेव ! ईश्वर का स्थान, आधार, देश, ग्राम कौन सा है ?
इन प्रश्नों का समाधान वेद वचनों से कर रहे हैं - यह ब्रह्म स्वामहिमा में रहता है, क्योंकि श्रुतियाँ ऐसा ही बताती हैं । उसका कोई देश विशेष नहीं, क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है और नित्य है ।
इसका कोई काल विशेष भी नहीं है, क्योंकि यह सर्वकाल में नित्य है । इसका आधार यही है, क्योंकि सबका अधिष्ठान होने से यह निराधार है ।
जो सबका अधिष्ठान होता है । उसका दूसरा अधिष्ठान नहीं हो सकता । क्योंकि सब उसमें अध्यस्त हैं । अध्यस्त मिथ्या होने से अधिष्ठान नहीं हो सकता । उसकी, चेतन होने से, कोई पृथक जाति भी नहीं है । शरीर न होने से वह एक तथा अद्वितीय है, क्योंकि जो एक होती हुई अनेकों में समवाय सम्बन्ध से रहती है ।
वह जाति कहलाती है । शरीर न होने से इसको किसी प्रिय अप्रिय का स्पर्श भी नहीं होता । यह सब शरीरों में सत्तापूर्ति देता हुआ सब में निवास करता है । अत: वह सर्वरूप है - ऐसा श्रुति में कहा गया है ॥२०८-२११॥
(क्रमशः)

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