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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १६. राग सोरठ =*
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(४/३)
*घट भीतरि नाचै गावै, घट भीतरि बेन बजावै ।*
*घट भीतरि फाग बसन्ता, घट भीतरि कामिनि कन्ता ॥६॥*
*घट भीतरि स्वर्ग पताला, घट भीतरि है क्षय काला ।*
*घट भीतरि युग युग जीवै, घट भीतरि अंमृत पीवै ॥७॥*
*जब घट सौं परचा होई, तब काल न ब्यापै कोई ।*
*जन सुन्दर कहि संमुझावै, सतगुरु बिन कोइ न पावै ॥८॥*
इस शरीर में ही हम आध्यात्मिक नृत्य, गायन, वेणु-वादन, वसन्त का क्रीडोत्सव, कामिनी एवं कान्त का आध्यात्मिक मिलन आदि सब कुछ कर सकते हैं ॥६॥
यदि हम वास्तविक साधना करें इस शरीर में ही स्वर्ग, पाताल, नरक, मृत्यु आदि का साक्षात्कार एवं युग युगान्तर तक चिरकालपर्यन्त जीवन तथा भगवद्भक्ति रसामृतपान भी कर सकते हैं ॥७॥
जब हम अपने इस शरीर का महत्त्व सद्गुरु की कृपा से पहचान लेंगे तो सभी आध्यात्मिक विषयों का साक्षात्कार यहाँ हो सकता है । यहाँ तक कि तब हमें मृत्यु का भी कोई भय नहीं रहेगा और हम शरीर में ही अमृतरसपान में भी समर्थ हो जायेंगे ॥८॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी जिज्ञासु साधक को सब ओर से स्पष्ट कर समझाने का प्रयास कर रहे हैं; परन्तु उनका भी प्रमाण वचन यही है कि यह सब भी सद्गुरु की कृपा के बिना कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता ॥८॥
(क्रमशः)

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