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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।*
*करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥*
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साभार ~ satsangosho.blogspot.com
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तस्मै सुखैकरूपाय.......।
उस सुख—रूप में झुकता हूं।
नम: शाताय तेजसे।
उस तेजस्वी में झुकता हूं। उस शांति के सागर में झुकता हूं।
भगवान बुद्ध के पास लोग आते थे तो उनके चरणों में झुक कर कहते - बुद्धं शरणं गच्छामि। किसी ने बुद्ध से पूछा कि आप तो कहते हैं कि किसी के चरण में मत झुको, लेकिन लोग आपके चरणों में झुकते हैं और कहते हैं : बुद्धं शरणं गच्छामि। आप रोकते नहीं? तो बुद्ध ने कहा, मैं रोकने वाला कौन?
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वे मेरी शरण थोड़े ही झुकते हैं, बुद्ध की शरण झुकते हैं। बुद्धत्व कुछ मुझमें सीमित थोड़े ही है। बुद्धत्व यानी जागरण की दशा। मुझसे पहले हजारों बुद्ध हुए हैं, मेरे बाद हजारों बुद्ध होंगे। जो आज बुद्ध नहीं हैं; वे भी बुद्धत्व को तो भीतर संभाले हुए हैं। किसी दिन प्रगट होगा। अभी बीज हैं, कभी वृक्ष बनेंगे ! अभी कली हैं; कभी फूल बनेंगे। अभी छुपे हैं; कभी प्रगट हो जाएंगे।
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बुद्धं शरणं गच्छामि। वे बुद्ध की शरण जाते हैं, उसका अर्थ यह नहीं है कि मेरी शरण जाते हैं। मैं कौन हूं? अगर मेरी शरण जाते हैं तो गलत जाते हैं। अगर बुद्धत्व की शरण जाते हैं तो ठीक जाते हैं। मैं रोकने वाला कौन? मैं बीच में आने वाला कौन?
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नमन उसके प्रति हो—प्रकाशरूप, शांतिरूप, सुखरूप—जिसके उदय से सारा संसार भ्रममात्र हो जाता है। संसार से ऐसे लगाव हैं कि मरते दम तक नहीं छूटता। मरता—मरता मनुष्य भी नहीं छोड़ता है।

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