रविवार, 24 फ़रवरी 2019

परिचय का अंग २२१/२२५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
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दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ देख्या करतारं ।
तहँ सेवक सेवा करै, अनन्त कला रवि सारं ॥२२१॥
दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ निरंजन वासं ।
तहँ जन तेरा एक पग, तेज पुंज प्रकाशं ॥२२२॥
दादू तेज कमल दिल नूर का, तहाँ राम रहमानं ।
तहँ कर सेवा बंदगी, जे तूँ चतुर सयानं ॥२२३॥
तहाँ हजूरी बंदगी, नूरी दिल में होइ ।
तहँ दादू सिजदा करै, जहाँ न देखै कोइ ॥२२४॥
दादू देही मांहि दोइ दिल, इक खाकी इक नूर ।
खाकी दिल सूझै नहीं, नूरी मंझि हजूर ॥२२५॥
वहाँ उसकी ज्योति अनन्त सूर्यों की तरह चमकती रहती है ।
वहां न सूर्य का प्रकाश है न चन्द्रमा का, न तारे चमकते हैं, न बिजली । तो फिर इस साधारण अग्नि की तो सत्ता ही क्या है कि वह वहां कुछ प्रकाश कर पायेगी । क्यों कि वहां तो उसके दिये हुये प्रकाश से ही सूर्यादिक प्रकाशित होते हैं । यहां तक कि उसी के प्रकाश से यह समस्त जगत प्रकाशित हो रहा है ।
इस जीवात्मा की हृद्गुहा में रहनेवाला परमात्मा सूक्ष्म से अति सूक्ष्म और महान से अतिमहान है । परमात्मा की उस महिमा को कामना व चिंता रहित होकर कोइ विरला ही साधक उस परमात्मा की कृपा से ही जान सकता है ।
अपने शरीर में ज्योति स्वरुप सर्व साक्षी रहता है, उसको निर्दोष साधक ही जान सकता है । मोहावृत तो उसे कभी नहीं जान सकता ।
इस शरीर में जीव और परमात्मा दोनों मित्र भाव से रहते हैं । उनमें, जीव अपने कर्म फल को भोगता हुआ शोकमग्न रहता है और परमात्मा प्रकाशरूप से शोभित होता है । वह शुद्ध अन्तःकरण द्वारा ही जाना जा सकता है । उसको जानने के लिए अपना अंतःकरण शुद्ध कर ॥२१९-२२५॥
(क्रमशः)

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