#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निगुणा का अँग ३३*
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सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने नीच ।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा के शिर मीच१॥२२॥
सुन्दर गुण वाला कृतज्ञ पुरुष अनेक भलाई करे तो भी कृतघ्न अपने कृतघ्नता रूप नीच स्वभाव के कारण उनको नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - कृतघ्न के सिर पर तो सदा मौत१ मंडराती रहती है अर्थात् वह बारँबार मरता ही रहेगा ।
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सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने नीच ।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा के शिर मीच१॥२२॥
सुन्दर गुण वाला कृतज्ञ पुरुष अनेक भलाई करे तो भी कृतघ्न अपने कृतघ्नता रूप नीच स्वभाव के कारण उनको नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - कृतघ्न के सिर पर तो सदा मौत१ मंडराती रहती है अर्थात् वह बारँबार मरता ही रहेगा ।
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साहिबजी सब गुण करै, सद्गुरु के घट होइ ।
दादू काढ़ै काल मुख, निगुणा न माने कोइ ॥२३॥
परमात्मा सद्गुरु के शरीर द्वारा जीवों को काल - मुख से बचाने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु कृतघ्न जीव गुरु के उपदेश को मानते ही नहीं ।
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साहिबजी सब गुण करै, सद्गुरु माँहीं आइ ।
दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटे जाइ ॥२४॥
परमात्मा जीवों के कल्याण की भावना से सद्गुरु रूप में आकर सब प्रकार से उपकार करते हुए जीव के वास्तविक - स्वरूप का बोध प्रदान करके रक्षा करते हैं, किन्तु कृतघ्न विषयासक्ति के कारण उस ज्ञान का खँडन करता जाता है, मानता ही नहीं ।
(क्रमशः)

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