#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि ।*
*अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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फहम फटकड़ी सौं लिखे, काया कागद माँहिं ।
रज्जब भीगें जुक्ति जल, अक्षर दैखे जाँहिं ॥४९॥
कागज में फिटकरी से लिखे हुये अक्षर जल से भीगते ही दीखने लगते हैं, वैसे ही ज्ञान द्वारा अंत:करण में अंकित विचार युक्ति पूर्वक प्रश्न करने से वाणी द्वारा बाहर आकर दीखने लगते हैं ।
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रज्जब दर्श१ दिसंतर२ सौं चले, मत३ मागहु४ पड़ प्रान५ ।
नगर नाम आये सभी, मेला७, रुचि घर६ जान ॥५०॥
नाथ, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष, इन षड् दर्शन१ रूप प्रदेश२ से इनके सिद्धान्त३ रूप मार्ग४ में आकर प्राणी५ चलते हैं और सभी ईश्वर नाम-चिन्तन रूप नगर में आ जाते हैं फिर उनमें परमधाम६ जाकर निज स्वरूप ब्रह्म में मिलन७ की रुचि उत्पन्न होती है ।
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रज्जब मनिषा१ देही, मुक्ति मुख२ आसै३ बासा होय ।
चौरासी विष बंद सब, सरकि सकै नहिं कोय ॥५१॥
चौरासी लाख योनियों के जीव विषय-विष की पाश में बंधे हुये हैं, प्रभु की ओर किचिंत भी नहीं चल सकते, मनुष्य१ देह मुक्ति-महल का द्वार२ है किन्तु इसमें से भी जहाँ की वासना३ होती है वहाँ ही बस जाता है, ऐसा ही शास्त्र-संतों से सुनते हैं और अनुभव में आता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित आसै आसण का अंग ६४ समाप्त ॥सा. २०५५॥
(क्रमशः)

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