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*शून्य सरोवर हंस मन, मोती आप अनंत ।*
*दादू चुगि चुगि चंचुभरि, यौं जन जीवैं संत ॥*
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साभार ~ अजय साक्षी रहो
ओशो..
मैं विद्यार्थी था जिस विश्वविद्यालय में, रोज सुबह घूमने जाता था। राह के किनारे, एक पुलिया पर, अक्सर बैठ जाता था। घंटों बैठा रहता था।
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एक प्रोफेसर भी घूमने आते थे। धीरे-धीरे उनसे परिचय हुआ। वे अक्सर मुझे वहां बैठा देखते थे। एक दिन कहने लगे, ऐसे बैठे-बैठे कुछ भी न होगा। अपना जीवन गंवा दोगे। कुछ करो। क्योंकि सांझ आता हूं, तुम यहां बैठे मिलते हो। सुबह आता हूं तब तुम यहां बैठे मिलते हो। आता हूं चला जाता हूं, तुम यहां बैठे ही रहते हो। कर क्या रहे हो बैठे-बैठे? मुझे तुम्हारे लिए चिंता होने लगी है।
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चिंता होने-योग्य बात थी, क्योंकि विश्वविद्यालय तो मुझे सिर्फ बहाना था, वहां मेरा कोई रस न था। वह तो बहाना दूसरों को दिखाने के लिए, कि कुछ कर रहा हूं, खाली नहीं बैठा हूं--अन्यथा परिवार के लोग परेशान होते, मित्र-प्रियजन पीड़ित होते--कुछ कर रहा हूं। वहां कुछ भी न कर रहा था। मैंने उनसे कहा, कभी दोपहर भी आओ, तब भी तुम मुझे यहां बैठा हुआ पाओगे। कभी आधी रात भी आओ, तब भी तुम मुझे यहां बैठा हुआ पाओगे। ज्यादातर बैठता ही हूं।
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वे नाराज हुए और कहा, इस तरह जीवन गंवा दोगे, ऐसे बैठे-बैठे कुछ न मिलेगा। मैंने उनसे पूछा, आप तो नहीं बैठे रहे, कुछ मिल गया? आप तो काफी दौड़े-धूपे हैं। अगर मिल गया हो, तो मुझे बता दें। और अगर न मिला हो, तो मुझ से बैठना सीख लें। उस दिन से उन्होंने उस रास्ते पर आना बंद कर दिया। मुझे देख लेते, तो दूर से ही लौट जाते। धीरे-धीरे बात आई-गई हो गई। मैं भूल ही गया।
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कोई तीन महीने बाद--एक दिन देखा कि वे आ रहे हैं, फिर लौटे भी नहीं। मैं चकित हुआ। वे पास आए, और कहने लगे, बाबा, क्षमा करो। क्यों मेरे पीछे पड़े हो? दिन में कई बार तुम्हारी याद आती है। और कल रात तो हद्द हो गई; रातभर सोने न दिया--सपने में भी ! बैठे हो; और मुझसे कह रहे हो, बैठो तुम भी। मुझसे भूल हो गई, जो मैंने कहा, और यही निवेदन करने आया हूं कि मैंने कुछ पाया नहीं चल कर। और अगर नहीं बैठ पा रहा हूं, तो सिर्फ इस कारण, कि चलने की आदत हो गई है। लेकिन कौन जाने, शायद तुम पा लो। मैं अपने शब्द वापिस लेता हूं।
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श्रद्धा तो बैठने का एक ढंग है। संदेह चलने की एक प्रक्रिया है। संदेह दौड़ है, श्रद्धा विराम है। संदेह पाने की आकांक्षा है। श्रद्धा "पा लिया' ऐसा भाव है। इसे तुम ठीक से समझ लो। क्योंकि अगर यही बीज न हुआ मूल में, तो जिस वृक्ष की हम कल्पना कर रहे हैं, वह कभी भी प्रगटेगा नहीं। श्रद्धा तो पा लिया--ऐसा भाव है; पहुंच गए--ऐसी प्रतीति है; आ गया मंदिर, कहीं जाने को नहीं और--ऐसी चित्तदशा है।
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संदेह सदा कहता है: और आगे--और आगे--। संदेह तो मील का पत्थर है, जिस पर तीर लगा है: और आगे--और आगे--। श्रद्धा तो ऐसी भावदशा है--यहीं; अभी और यहीं।
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संदेह वाले व्यक्ति को, श्रद्धा वाला व्यक्ति अंधा दिखाई पड़ता है। श्रद्धा वाले व्यक्ति को, संदेह वाले व्यक्ति पर दया आती है, कि नाहक व्यर्थ ही दौड़े चले जा रहे हैं। कहीं पहुंचेगा नहीं, गिरेगा; और बुरी तरह गिरेगा।
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श्रद्धा वाला आदमी भी कब्र में उतरता है, लेकिन उसके उतरने में एक शान होती है। कब्र में भी जाता है, तो शाही ढंग से जाता है। उसकी समाधि साधारण समाधि नहीं होती। उसकी समाधि परमात्मा से मिलन का द्वार होती है।
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संदेह वाला भी गिरता है; बुरी तरह गिरता है; कब्र में ही गिरता है; मुंह में धूल भर जाती है। चीखता है, चिल्लाता है, बचना चाहता है। जिंदगी भर चला है, और कब्र रोक देती है--कब्र दुश्मन मालूम होती है। मृत्यु से भय लगता है।
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श्रद्धा वाला तो जीवन भर बैठा है। बाहर बैठा था कि कब्र में बैठा है, कोई फर्क नहीं पड़ता है। मृत्यु मित्र मालूम होती है। और जिसने जान लिया, कि मृत्यु मित्र है, उसने सब जान लिया। उसने जीवन के सब खजाने पा लिए। और जो मृत्यु से डरता रहा और भागता रहा, उसने सब गंवा दिया। जीवन में जो भी पाने योग्य था, उस सबसे वह वंचित रह जाएगा।
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श्रद्धा वाले व्यक्ति को दया आती है; क्योंकि लगता है, संदेह वाला व्यर्थ ही भागता है। पसीने-पसीने, लथ-पथ, सदा थका हुआ मालूम पड़ता है--और ऐसे ही गिरेगा। कोई मंजिल हाथ न आएगी। क्योंकि मंजिल तो वहीं थी, जहां तुम थे। जितने दौड़ोगे, उतने ही दूर निकल जाओगे।
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क्योंकि मंजिल तो तुम हो। कुछ और पाना थोड़े ही है! जो तुम्हें मिला ही हुआ है, उसे भर जानना है। कहीं पहुंचना थोड़े ही है। तुम वहां हो ही सदा से। थोड़ी आंखभर खोलनी है। थोड़ा स्मरण करना है। थोड़ी सुरति आ जाएं, थोड़ा होश आ जाए, तो तुम अचानक हंसोगे, कि मैं जा कहां रहा था ! मैं खोज किसे रहा था ! खोजने वाला ही तो वह है, जिसे हम खोज रहे थे। सम्राटों का सम्राट भीतर है !
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श्रद्धा विश्राम बना देती है। क्योंकि जब चित्त में कोई विरोध ही न रहा, कोई विषमता न रही, सब थिर हो गया, तो गति शून्य हो जाती है। उस गति-शून्य दशा का नाम समाधि है।
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पिव पिव लागी प्यास-(दादू दयाल)-प्रवचन--03

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