शुक्रवार, 31 मई 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*एकै शब्द अनन्त शिष, जब सतगुरु बोले ।*
*दादू जड़े कपाट सब, दे कूँची खोले ॥*
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साभार ~ Swami Kaushik Chaitanya ji

*॥ सद्गुरुदेव महिमा ॥*

*ब्रम्हा विष्णुश्च रुद्रत्व वह्नि वै च मरुद्गण: ।*
*पृथिव्यां सर्व देवानां न तुल्यं गुरु य: सत: ॥*
हजारों - लाखों देवता हैं और उनमें भी ब्रम्हा, विष्णु और महादेव सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, इनके अलावा भी इन्द्र, अग्नि, वरुण, सूर्य, मरूद्गण, यम, कुबेर, बगलामुखी, धूमावती, कमला, लक्ष्मी, सरस्वती आदि अन्य भी देवी - देवता हैं, ये सभी देवी - देवता भी गुरु के सामने तुच्छ हैं, न्यून हैं । इसलिए कि शास्त्र स्वयं कहता है, यदि कोई ब्रम्ह है तो वह साक्षात् श्रीगुरु ही हैं -
*गुरर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: ।*
*गुरु साक्षात् पर ब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नम: ॥*
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मैं गुरु को प्रणाम इसलिए करता हूं कि वे इन सभी देवताओं से भी उच्च पूर्ण ब्रम्ह हैं । इसलिए जो भी व्यक्ति, जो शिष्य इन छोटे - छोटे देवी - देवताओं की साधना, उपासना, ध्यान, मनन करता है वह ठीक है, परन्तु पत्तों को, डालियों को पानी पिलाने की अपेक्षा सीधे जड़ में ही पानी दिया जाए तो वृक्ष निश्चय ही हरा - भरा होता है, पूर्णता प्राप्त करता है, सघन छायादार वृक्ष बन जाता है और उसकी छाया तले हजारों - हजारों लोग विश्राम करते हैं ।
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गुरु ऐसा ही एक सघन वृक्ष होता है, इसलिए शिष्य को चाहिए कि वह अन्य देवी - देवताओं की अपेक्षा गुरुचरणों को ही अपना तीर्थ माने, गुरु पूजा को ही अपनी पूजा माने, गुरु ध्यान को ही ध्यान माने, गुरु में समर्पण को ही अपना लक्ष्य माने और गुरु को ही सभी देवताओं में श्रेष्ठ माने, ऐसा चिंतन रखने वाला व्यक्ति ही सही अर्थों में शिष्य कहला सकता है ।
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जो ऐसा शिष्य होता है, जिसके मन में ऐसी भावना होती है, जिसके मन में ऐसा चिंतन और विचार होता है, जिसकी ऐसी धारणा होती है, जो इस ध्यान को अपने मन में संजो कर रखता है, जिसकी जीभ पर गुरु का ही नाम होता है, वह सही अर्थों में शिष्य होता है, वह सही अर्थों में पूर्णता प्राप्त करता है, वह सही अर्थों में चैतन्यता को प्राप्त करता है और वह सही अर्थों में दिव्यता प्राप्त कर पाता है ।
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यदि गुरु की ऐसी कृपा प्राप्त कर ली जाती है तो फिर उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता रह ही नहीं सकती, वह सभी लोकों में अपने आप में अद्वितीय और श्रेष्ठ बन जाता है । इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि समस्त देवगण अपूर्ण हैं, पूर्ण गुरुत्व की समता इनसे कैसे की जा सकती है।
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॥ सद्गुरुदेव ॥

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