गुरुवार, 30 मई 2019

= सुन्दर पदावली(२२. राग सारंग - ९) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*सन्तनि जब गृह पाव धरे ।* 
*धन्य दिवस सोइ घरी महूरत,*
*जा क्षण दृष्टि परे ॥(टेक)* 
*अति आनन्द भयौ मन मेरै,*
*बिगसत अंक भरे ।* 
*करि दण्डौत प्रदक्षिण दीनी,*
*नष शिख अंग ठरे ॥१॥* 
*बिनती बहुत करी तिन आगै,*
*दीन बचन उचरे ।* 
*होइ प्रसन्न मन्दिर महिं आये,*
*पावन धाम करे ॥२॥* 
*चरण पषालि लियौ चरनौदिक,*
*पूरब पाप गरे ।* 
*सुन्दर तिनकौ दरसन पावत,*
*कारिज सकल सरे ॥३॥* 
सन्तों ने ज्यौं ही मेरे घर में चरण रखा मेरा वह दिन, वह मुहूर्त, वह घड़ी धन्य हो गये जैसे ही उनकी पावन दृष्टि मुझ पर पड़ी ॥टेक॥ 
मेरे हृदय में उसी समय अतिशय आनन्द उमड़ आया । मेरे समस्त शरीर के अंग हर्ष विभोर हो गये । मैंने उनको सम्मान प्रदर्शन हेतु दण्डवत् प्रणाम करते हुए उनकी प्रदक्षिणा की । मेरे नख से शिखा तक सभी अंग हर्ष विभोर हो गये ॥१॥ 
मैंने उनके सम्मुख अनेक प्रकार से विनती की तथा करुणापूर्ण वचन कहे । तब वे प्रसन्न होकर मेरे मन मन्दिर में विराजे तथा उसको अपना पवित्र वासस्थान बना लिया ॥२॥ 
तब मैंने उनके चरणों का धोया हुआ पावन अमृत पान किया । उसका तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि मेरे सभी पाप विनष्ट हो गये । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – उनके दर्शन होते ही मेरे समस्त अवशिष्ट कार्य भी पूर्ण हो गये ॥३॥
(क्रमशः)

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