#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*विनती का अँग ३४*
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*क्षण विछोह*
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी१ दुहेली२ देह३ ॥७७॥
७६ - ७७ में कहते हैं - प्रभु का एक क्षण का वियोग भी हमें दु:खप्रद है - यदि हमारा सच्चा प्रेम होता तो हमारे भगवान् भी हम से स्नेह करते और भगवान् से मिलकर हम दर्शनानन्द रूप खेल खेलते, किन्तु हमारे प्रेम और उनके स्नेह के अभाव से उनके दर्शन न होने के कारण मेरी जीवात्मा३ वास्तव१ में दुखी२ है ।
(क्रमशः)

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