#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साक्षीभूत का अँग ३५*
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बुरा भला शिर जीव के, होवे इस ही माँहिं ।
दादू कर्ता कर रह्या, सो शिर दीजै नाँहिं ॥१०॥
जीव के किये हुए बुरे - भले कर्म का फल जीव को ही भोगना पड़ता है, कारण, बुरे - भले कर्म के करने की भावना इस जीव के अन्त:करण में ही होती है, अत: स्वत: सँसार व्यवस्थार्थ ईश्वर ने जो रचना की है, उस का कर्म - फल उसके शिर नहीं पटकना चाहिये ।
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*साधु साक्षीभूत*
कर्ता ह्वै कर कुछ करे, उस माँहि बंधावे ।
दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥११॥
११ - १६ में सन्त की साक्षीरूपता दिखा रहे हैं, जो अपने को कर्त्ता मानकर जो कुछ कर्म करता है, वह उसकी फलाशा से बँध कर, अपने कर्मों फल सुख - दु:ख को भोगता है, अत: इस सुख - दु:ख का कारण पूछने पर वह निरुत्तर हो जाता है । किन्तु जो ज्ञानी सन्त फलाशा से रहित, कर्म का साक्षी रूप होकर कर्म करते हैं वे कर्म का फल चाहते ही नहीं । अत: उन्हें सुख - दु:ख अनुभूति भी नहीं होती ।
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दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जाहिं ।
केई आइ पूजा करैं, केई खिलावें खाहिं ॥१२॥
फलाशा से कितने ही लोग भक्ति करने का भाव हृदय में रखकर आरती उतारते हैं, सेवा करते हैं, समय पर आकर पूजा करते हैं, और खिलाने के पश्चात् प्रसाद खाते हैं ।
(क्रमशः)

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