#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*पिय मेरै बार कहा धौं लाई ।*
*ॠतु बसन्त मोहि वा बिधि बीती,*
*अब बरिषा ॠतु आई ॥(टेक)*
*बादल उमगि चले चहुं दिशि तें,*
*गरज सुनी नहिं जाई ।*
*दामिनि दमक करेजा कम्पै,*
*बून्द लगत दुखदाई ॥१॥*
*कारी रैंनि अन्धारी देषत,*
*बारी बैस डराई ।*
*जारी बिरह पुकारी कोकिल,*
*भारी आगि लगाई ॥२॥*
हे प्रिय ! मुझसे मिलन का अवसर आने पर यह विलम्ब क्यों कर रहे हैं ? मेरी वसन्त ॠतु तो आपकी उपेक्षा बीत ही गयी, अब वर्षा ॠतु की वही स्थति होने जा रही है ॥टेक॥
चारों ओर से मेघ उमड़ घुमड़ कर चले आ रहे हैं, बिजली की कड़क सुनी नहीं जा रही है । उसकी चमक से हृदय में कम्पन हो रहा है । वर्षा की बूंदे दुःख ही दे रही हैं ॥१॥
यह अँधेरी रात्रि, और मेरी यह बाल्य अवस्था, इधर मेरी यह विरहावस्था उधर कोयल की मीठी कुहुक । इन सबने मिल कर मेरे शरीर में भयंकर जलन पैदा कर दी है ॥२॥
(क्रमशः)

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