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*दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ ।*
*जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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आदम१ सेती२ औलिया३, नर नारायण होय ।
मुक्ति द्वार मिनखा जनम, रज्जब बाद४ न खोय ॥५॥
मनुष्य देह प्राप्त करके मनुष्य१ से२ सिद्ध संत३ हो जाता है, नर से नारायण हो जाता है, यह मनुष्य जन्म मुक्ति महल का द्वार है, इसे व्यर्थ४ मत खो ।
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हरि सुमिरण की ठौर यहु, मनिखा देही मांहिं ।
सो ठाहर सौंपी तुझे, रज्जब समझे नाँहिं ॥६॥
मनुष्य शरीर रूप स्थान ही हरि भजन के लिये उचित है, इसी में ही हरि भजन होता है, वही मनुष्य शरीर रूप स्थान प्रभु ने तुझे दिया है किन्तु तू समझता नहीं इसलिये इसे विषय उपभोग में ही व्यर्थ खो रहा है ।
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इन्द्रिय दमि१ सुमिरण करै, यहु शम दम शुध२ माग३ ।
जन रज्जब जो जीव चलै, ताके मोटे भाग४ ॥७॥
इन्द्रियों को जीत१ करके हरि स्मरण करना चाहिये, यह मन निरोध रूप शम और इन्द्रिय निग्रह रूप दम, प्रभु प्राप्ति के लिये शुद्ध२ मार्ग३ है, जो जीव इस मार्ग में चलता है, उसका भाग्य४ विशाल ही है ।
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शरीर सु साँचा मैण१ मति२, ब्रह्म अग्नि औटावहु धात३ ।
जा रहु गारौ गाभा४ ज्ञान, मूरति उपजै पद निर्वान ॥८॥
शरीर साँचा है, ज्ञान२ मोम१ है, ब्रह्म अग्नि है, जैसे मोम अग्नि से तप कर साँचे के समान हो जाता है, वैसे ही ज्ञान इन्द्रियादि शरीर के समान ही बना रहता है । अग्नि जला के धातु३ को तपा-गला कर और उसका दोष जलाकर, उसकी मूर्ति बना देते हैं, वैसे ही ब्रह्म चिन्तन से देहाध्यास को गलाओ और क्रोधादि वृत्ति रूप अंकुरों४ को जलाओ, इस प्रकार शरीर शुद्ध होगा तब निर्वाण पद को देने वाला शुद्ध ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न होगा ।
(क्रमशः)

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