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*दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर ।*
*नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥*
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साभार ~ Atul Verma
सुना है मैंने, एक आदमी भागा हुआ जा रहा है एक रास्ते से। तेजी में है। सांझ ढलने के करीब है। राह के किनारे बैठे हुए एक आदमी से उसने पूछा कि दिल्ली कितनी दूर है? उस बूढ़े आदमी ने कहा, दो बातों का जवाब पहले दे दो, फिर मैं बताऊं कि दिल्ली कितनी दूर है। उसने कहा, अजीब आदमी मिले तुम भी ! इतना सीधा बता दो कि दिल्ली कितनी दूर है। दो बातों के सवाल और जवाब का क्या सवाल है? उस बूढ़े आदमी ने कहा, फिर मुझसे मत पूछो। क्योंकि मैं गलत जवाब देना कभी पसंद नहीं करता।
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कोई और नहीं था, इसलिए मजबूरी में उस जल्दी जाने वाले आदमी को भी उस बूढ़े से कहना पड़ा, अच्छा भाई, पूछ लो तुम्हारे सवाल। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता; कोई संगति नहीं है। मैं पूछता हूं, दिल्ली कितनी दूर है, इसमें मुझसे पूछने का कोई सवाल ही नहीं है।
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पर उस बूढ़े ने कहा, तो तुम जाओ। नहीं तो मेरे दो सवाल ! पहला तो यह कि तुम जिस तरफ जा रहे हो, इसी तरफ जाने का इरादा है? तो दिल्ली बहुत दूर है। क्योंकि दिल्ली आठ मील पीछे छूट गई है। अगर ऐसे ही जाने का है, तो दिल्ली पहुंचोगे जरूर, यह मैं नहीं कहता कि गलत जा रहे हो, लेकिन पूरी जमीन का चक्कर लगाकर। और वह भी बिलकुल सीधी, नाक की रेखा में चलना। जरा चूके, कि चक्कर चूक गया, तो दिल्ली से फिर बचकर निकल जा सकते हो। सिर मत हिलाना जरा भी। बिलकुल नाक की सीध में जाना। फिर भी मैं पक्का नहीं कहता कि दिल्ली पहुंचोगे। सारी जमीन घूमकर भी जरा भी चूक गए, इरछे-तिरछे हो गए, तो फिर चूक जाओगे। इसलिए मैं पूछता हूं कि इरादा क्या है? इसी तरफ जाने का है? और अगर लौटने की तैयारी हो, तो दिल्ली बहुत पास है; पीठ के पीछे है। आठ ही मील का फासला है।
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उस आदमी ने कहा, यह मेरी समझ में आया। माफ करो कि मैंने तुमसे कहा कि असंगत बात पूछते हो। संगत बात थी। लेकिन दूसरा क्या सवाल है?
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उस आदमी ने कहा कि जरा चलकर भी मुझे बताओ कि कितनी चाल से चलते हो। क्योंकि दूरी चाल पर निर्भर करती है, मीलों पर नहीं। आठ मील, तेज चलने वाले के लिए चार मील हो जाएंगे; धीरे चलने वाले के लिए सोलह मील हो जाएंगे। और एक कदम चलकर बैठ गए, तो आठ मील अनंत हो जाएंगे। इसलिए जरा चलकर बताओ ! चाल क्या है? क्योंकि सब रिलेटिव है। दिल्ली की दूरी या सभी दूरियां रिलेटिव हैं, सापेक्ष हैं। कितना चलते हो?
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उस आदमी ने कहा कि माफ करना। यह भी मेरे खयाल में नहीं था। तुम ठीक ही पूछते हो।
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परमात्मा भी, जिस दिशा में हम जाते हैं, पदार्थ की दिशा में, वहां हमें कभी नहीं मिलेगा। दिल्ली तो शायद मिल जाए, दिल्ली के उलटे चलकर भी, क्योंकि जमीन का घेरा बहुत बड़ा नहीं है। लेकिन पदार्थ का घेरा अनंत है। अगर हम पदार्थ की तरफ खोजते हुए चलते हैं, तो हम अनंत तक भटक जाएं, तो भी परमात्मा तक नहीं लौटेंगे।
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तो एक तो पदार्थ का घेरा अनंत है, जमीन का घेरा तो बहुत छोटा है। यह जमीन तो बहुत मीडियाकर प्लेनेट है; बहुत ही गरीब, छोटा-मोटा, क्षुद्र। इसकी कोई गिनती नहीं है। यह हमारा सूरज इस पृथ्वी से साठ हजार गुना बड़ा है। लेकिन हमारा सूरज भी बहुत मीडियाकर है। वह भी बहुत मध्यमवर्गीय प्राणी है, मिडिल क्लास ! उससे हजार-हजार, दस-दस हजार गुने बड़े सूर्य हैं, महासूर्य हैं। इस पृथ्वी की तो कोई गिनती नहीं है। यह तो बड़ी छोटी जगह है। वह तो हम बहुत छोटे हैं, इसलिए पृथ्वी बड़ी मालूम पड़ती है। इसकी स्थिति बहुत बड़ी नहीं है। चले जाएं, तो पहुंच ही जाएंगे दिल्ली। लेकिन पदार्थ तो अनंत है। उसके फैलाव का तो कोई अंत नहीं। वह तो हम कितना ही चलते जाएंगे, वह आगे-आगे-आगे मौजूद रहेगा।
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तो एक फर्क तो यह करना चाहता हूं कि पदार्थ अनंत है, इसलिए उस दिशा से कभी परमात्मा तक नहीं आ पाएंगे, लौटना ही पड़ेगा।
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जैनों के पास एक बहुत अच्छा शब्द है, वह है, प्रतिक्रमण। प्रतिक्रमण का अर्थ है, रिटर्न बैक, वापस लौटना। आक्रमण का अर्थ है, जाना, हमला करना; और प्रतिक्रमण का अर्थ है, वापस लौटना। हम सब आक्रामक हैं पदार्थ की तरफ, वही पाप है। प्रतिक्रमण पुण्य है। वापस लौट आएं।
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तो एक तो यह आपसे कहना चाहता हूं कि पदार्थ अनंत है, इसलिए कितना ही आक्रमण करो, कभी भी पा न सकोगे प्रभु को। और जब तक प्रभु न मिल जाए, तब तक शांति नहीं, संतोष नहीं, चैन नहीं। और दूसरी बात यह कहना चाहता हूं कि उस बूढ़े ने कहा कि पीछे लौटो, दिल्ली आठ मील दूर है। मैं आपसे कहना चाहता हूं, पीछे लौटो, परमात्मा आठ इंच भी दूर नहीं है। आठ मील बहुत ज्यादा है। असल में पीछे लौटो, तो आप ही परमात्मा हो। अगर ठीक से कहें, तो ऐसा कहना पड़ेगा। जरा-सा भी फासला नहीं है।
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मोहम्मद ने कहा है–कोई पूछता है मोहम्मद से कि प्रभु कितने दूर है–तो वे कहते हैं कि यह जो गले की धड़कती हुई नस है, इससे भी ज्यादा निकट। इसे काट दो, तो आदमी मर जाता है। यह जीवन के बहुत किनारे है। मोहम्मद कहते हैं, यह जो गले की धड़कती नस है, इससे भी निकट, इससे भी पास, जीवन से भी पास।
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लौटने भर की देरी है। लौटकर चलना भी नहीं पड़ता, क्योंकि चलने लायक फासला भी नहीं है। सिर्फ लौटना, जस्ट रिटर्न इज़ इनफ। पर अबाउट टर्न, पूरा का पूरा लौटना पड़े, एकदम पूरा। मुख जहां है, उससे उलटा कर लेना पड़े।
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पदार्थ की तरफ जो उन्मुखता है, वह पाप है। और पदार्थ की तरफ पीठ कर लेना पुण्य है। इसलिए दान पुण्य बन गया, और कोई कारण न था। क्योंकि जिसने धन दिया, उसने प्रतिक्रमण शुरू किया। जिसने धन लिया, उसने आक्रमण किया। इसलिए त्याग पुण्य बन गया, क्योंकि त्याग का अर्थ है, पदार्थ की तरफ पीठ कर ली।
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बुद्ध ने जो शब्द उपयोग किया है, वह है, संपत्ति। वह बहुत बढ़िया शब्द है। बुद्ध ने कहा, संपत्ति तो वही है, जिससे संतोष मिल जाए। वहां तो मैंने सिर्फ विपत्ति पाई, क्योंकि सिवाय दुख के कुछ भी न पाया। विपत्ति पाई। जिसे तुम संपत्ति कहते हो, वह विपत्ति है। मैं उसे छोड़कर जा रहा हूं। विपत्ति को छोड़कर जा रहा हूं संपत्ति की तलाश में।
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छोड़ने को नहीं कह रहा हूं, समझने को कह रहा हूं। समझ से तत्काल रस छूट जाता है। फिर आप कहीं भी रहें; फिर आप कहीं भी रहें–मकान में रहें कि मकान के बाहर–इससे फर्क नहीं पड़ता। फिर मकान के भीतर भी आप जानते हैं कि मकान में नहीं हैं। फिर आपके हाथ में धन रहे या न रहे, लेकिन भरा हुआ हाथ भी जानता है कि गहरे अर्थों में सब कुछ खाली है। और जिस दिन वह समझ पैदा हो जाती है, उस दिन प्रतिक्रमण शुरू हो जाता है।
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पाप है, आक्रमण पदार्थ पर; पुण्य है, प्रतिक्रमण पदार्थ से। और समझ के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। क्योंकि नासमझी के अतिरिक्त पदार्थ से कोई जोड़ नहीं है हमारा। नासमझी ही हमारा जोड़ है। नासमझ हैं, इसीलिए जुड़े हैं। सोचते हैं, संपत्ति है, इसलिए पकड़े हैं। जान लेंगे कि संपत्ति नहीं है, हाथ खुल जाएंगे, पकड़ छूट जाएगी।
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ध्यान रहे, पकड़ छूट जाने का अर्थ भाग जाना नहीं है, एस्केप नहीं है; क्लिंगिंग छूट जाना है, पकड़ छूट जाना है। ठीक है, वस्तुएं हैं, उनका उपयोग किया जा सकता है। बराबर किया जाना चाहिए। वह परमात्मा की अनुकंपा है कि इतनी वस्तुएं हैं और उनका उपयोग किया जाए। जीवन के लिए उनकी जरूरत है। लेकिन प्रभु को पाने के लिए उन पर जो हमारी पकड़ है…।
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पकड़ बड़ी अजीब चीज है। पकड़ सिर्फ खयाल है।
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गीता-दर्शन भाग 3,
अध्याय-6, OSHO

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