गुरुवार, 4 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१-३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*साक्षीभूत का अंग ३५*
‘‘खुशी तुम्हारी त्यूं करो, हम तो मानी हार’’ - इस सूत्र के व्याख्यान स्वरूप, विनती के अंग के तदनन्तर साक्षी स्वरूप का विचार करने के लिये साक्षीभूत का अंग निरूपण करते हैं ।
.
*मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
टीका ~ हे सर्व के साक्षी रूप निरंजन देव ! आपको हमारी बारम्बार नमो - नमो है और जो गुरुदेव निरंजन को साक्षी रूप क रके जाना है, उनको भी हमारी नमस्कार है और सर्व ही संत जो उस परमेश्वर को साक्षीरूप बनाकर, उसके स्मरण में लग रहे हैं, उनको भी हम वन्दना करते हैं । इस प्रकार हरि, गुरु, संतों को जो प्रणाम करते हैं, वे संसार से पार होकर ‘गतः’, कहिये साक्षी रूप परमात्मा में अभेद होते हैं ॥१॥
.
*भ्रम विध्वंसन*
*सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।*
*दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥२॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह अधिष्ठान रूप चेतन परमात्मा, सब संसार के शुभ, अशुभ कर्मों को भीतर साक्षीरूप से देखता रहता है और सर्व के अन्दर प्रेरणा करता है तथा सर्व का साक्षी है । उसी परमात्मा रूप साक्षी में अपनी वृत्ति को स्थिर कर और संसार के नाश होने वाले पदार्थों में आसक्त मत हो ॥२॥
.
*मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप ।*
*दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥३॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! मांही तै कहिए, शरीर के भीतर अन्तःकरण में, वह अन्तर्यामी रूप साक्षी, प्रेरणा रूप उपदेश करते हैं कि सच्चा तो एक मेरा एक जाप ही है । माया और माया का कार्य रूप सब धन्धे जीव को फँसाने वाले हैं अथवा संसार के वासनामय कर्म सब व्यर्थ हैं ॥३॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें