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*दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।*
*निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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दया न दीसै दृष्टि में, देह दया का मूल ।
रज्जब सुमिरण सारिखा१, अज्जब२ बण्या अस्थूल ॥९॥
जीवों की दृष्टि में प्रभु की दया नहीं दीखती किन्तु यह मनुष्य उनकी दया का ही मूल है अर्थात मनुष्य शरीर देकर प्रभु ने दया की ही जड़ रोपी है, उनकी दया से ही तो हरि-स्मरण करने के समान१ अर्थात योग्य अद्भुत२ स्थूल शरीर बना है ।
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सकल भजन का मूल है, मिनखा देही माँहिं ।
रज्जब जीव जाणें नहीं, कहैं दया कुछ नाँहिं ॥१०॥
सर्व प्रकार भजन करने का मूल साधन अनुकूलता मनुष्य शरीर में है और वही प्रभु ने दे दिया किन्तु जीव उसे नहीं जानते, इसलिये कहते हैं, हमारे पर प्रभु की कुछ भी दया नहीं है ।
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मिनखा देह मौज१ दी, सत जत२ सुमिरण काज ।
रज्जब मारि३ न मांजरै४, सौंज५ दई६ सिरताज ॥११॥
मनुष्य शरीर का आनन्द१ ब्रह्मचर्य२ पूर्वक सत्य प्रभु का स्मरण करने के लिये दिया है, इसको विषयों में आसक्त हो पंजर४ करके नष्ट३ मत कर, प्रभु ने तुझे यह मुक्ति की शिरोमणी साधन सामग्री५ दी६ है ।
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चौरासी सौं काढि कर, जब दी मिनखा देह ।
राम कछु राख्या नहीं, रज्जब समझ सनेह ॥१२॥
चौरासी लाख योनियों से निकाल कर जब मनुष्य देह दिया है तब राम ने देने योग्य कुछ भी नहीं रक्खा है, राम ने जो तेरे ऊपर स्नेह किया है उसे समझकर राम का भजन कर ।
(क्रमशः)

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