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*तन नाहीं जहँ,*
*मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये ।*
*शब्द नहीं जहँ,*
*जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद २६८)
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साभार ~ Rupa Khant
एक प्रश्न ....कल रात को यज्ञ कुंड के पास कुछ चिट्ठीयाँ थी ...मैं पढ़ रहा था ...एक युवक ने पूछा है कि बापू ...मैं आपका युवान flower हूँ ...आप अभी मौन रख रहे हैं ...कथा में बोलते है ...तो ये मौन भक्ति है ?....
बापू बोले ... हाँ बेटा मौन नवों भक्ति है ..
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एक कथा मैं करूँगा ...**मानस मौन **
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हम रह रहे हैं मौनी बाबा के आश्रम में ...ठीक जगह ले आये ...मौनी बाबा के यहाँ मौनी बाबा आया ...ऐसा है ..1 बार करेंगे मानस मौन ....पूरा साधना का पक्ष ...चिंतन का पक्ष ...और अनुभव का पक्ष रहेगा ...
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मौन में नवों भक्ति है ....
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१...श्रवणं ...मौन ये श्रवण भक्ति है ...आप चुप बैठे हैं इसलिये श्रवण भक्ति कर रहे हैं ...लेकिन मौन में नाद मुक्त वीणा की आवाज आती है ...वहाँ पहुँचना कठिन है ....
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२...कीर्तनं ...शरीर बैठा है ...कोई अंदर गा रहा है ...ये मौन की कीर्तनं भक्ति है ...
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३...स्मरणं ...मौन रहो तब तुम्हारा गुरु किसी स्मृति को भेजेगा ...और आपको आश्चर्य होगा कि मुझमें कहाँ से उतरा ....शब्द से सांसारिक स्मृति होती है ...लेकिन गुरु जब देता है ...उसी के प्रसाद से जब स्मृति आती है तब अंदर झंझनाहट बोलती है ....
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४...पाद सेवनं ...चुप चाप बैठे हैं ...स्मरण शुरु हुआ ...कोई कारण नहीं ...गंगा के तट बैठे हैं early सुबह ...और अचानक स्मरण के कारण ...किसी की कृपा के कारण ...और आँखों से अश्रुपात होने लगे तो समझना यही अस्तित्व की पाद पूजा है ....परम को याद करके आँखों से प्रगट हुए आँसू भले ही हम शॉल में या पालव में ले लें लेकिन ये आँसू इधर उधर जाते ही नहीं ...बुद्धपुरुष की पादुका पर ही जाते हैं ....
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५...अर्चनं ...अर्चनं माने पूजा ..अर्चा ...स्थूल रुप में भी हो सकती है ...और मौन में मानस रुप में हो सकती है ...
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६...वंदनं ...ना सिर झुके ..ना हाथ जुडे ..ना पलकें झुकें ...ना जुबान बोले ...केवल चुप ...और भीतर से एक रूहानी नमस्कार शुरु हो जाये ...
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७...दास्यं ...जागृती में दासत्व का अहंकार भी आ जाता है ...मौन में दासत्व का अहंकार नहीं आता क्यूँकि मौन में आप किसीकी सेवा करते हैं ...दूसरा जानता नहीं ...स्थूल रुप में भी आप जना नहीं पाओगे क्यूँकि आप मौन हैं ....
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८...सख्यं ...प्रभु से मैत्री ...मौन बहुत भगवान के करीब लिये चलता है ....
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९...आत्म निवेदनं ...शब्दों से किया हुआ आत्म निवेदन दांभिक भी हो सकता है ....जब आत्मा निवेदन करे ...ये मौन में आता है .....
बापू के शब्द ~ मानस गंगोत्री
जय सियाराम

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