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*तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग ।*
*दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १३४)
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साभार ~ Tiwari Harshdev Shashtri
उपनिषद् का महावचन है ..... "तेन त्यक्तेन भुंजीथा"............ ओशो जी ने कहा कि यह कथन मुझे सबसे क्रान्तिकारी लगा .........उनके शब्दों में .......यह वचन बड़ा अनूठा है और उसके दो अर्थ हो सकते हैं एक अर्थ जिन्होंने त्यागा उन्होंने भोगा और दूसरा जिन्होंने भोगा उन्होंने त्यागा .........
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दोनों अर्थ बहुमूल्य हैं और दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ..................जिन्होंने भोगा उन्होंने ही त्यागा .......जब तक भोगोगे नहीं तब तक त्यागोगे क्या ...? त्याग की समझ कहाँ से आएगी .....
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भोग कीचड़ से ही उठेगा त्याग का कमल और कोई उपाय नहीं है ..........संत तुलसी दास जी ने भोग त्यागा तब संत हुए ........ भोग की निंदा मत करना कीचड़ छोड़कर मत भागना ..... अन्यथा कमल से वंचित रह जाओगे क्योकि कीचड़ से ही कमल खिलेगा ......
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तुम्हारे बीच से ही परमात्मा उठेगा ..........छोड़ने की फ़िक्र छोडो पाने की चेष्टा करो ......छोड़ने पर जोर मत दो पाने पर जोर दो ........ जब आप के हाथ हीरे जवाहरात लगने लगेंगे तब कंकर पत्थर अपने आप छुट जायेंगे ......... किन्तु यदि आप खुद कंकर पत्थर फेक दो तो गारंटी नहीं की हीरे जवाहरात आएंगे ही .........
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तुम भोग लोगे तो उस भोग से त्याग का जन्म होगा और यदि आपने भोगा ही नहीं तो आप का मन उसके तरफ भटकने की संभावना बनी रहेगी ............ *भोग तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र है किन्तु मेरी एक शर्त है कि .......होशपूर्वक भोगो...........*
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ऐसा न हो कि अनुभव भी गुजरता जाये और सीख भी ना मिले .........बस अनुभव से कुछ सीख मिल जाये ........नरक से भी गुजरना उपयोगी है किन्तु जब आप जागे हुए हो तो, क्योंकि उसी जगने में स्वर्ग का रास्ता मिलेगा ........ पुराने संन्यास की धारणा थी कि लोगों को संसार से छुडवावो ताकि वे परमात्मा को पा सकें मेरी धारणा यह है कि लोगों को परमात्मा के निकट लाओ ताकि संसार उनसे छूट सके |
🌹🙏मंगल सुप्रभात🙏🌹
🌹🙏जय जय श्री राधे 🙏🌹
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