शुक्रवार, 21 जून 2019

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(१७/२०)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*राम तुम्हारे नांव बिन, जे मुख निकसै और ।*
*तो इस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
इक नेकी१ अरु नाम को, नर नारायण कीन । 
सो हरि हित समझे नहीं, तो रज्जब मति हीन ॥१७॥ 
भलाई१ और नाम-स्मरण के लिये ही नाराराण ने नर देह उत्पन्न किया है । हरि ने जो प्राणी का हित किया है, उसे न समझे तो वह जीव बुद्धिहीन ही है । 
जन रज्जब जग जाय जिव१, लहि२ आदम३ औलाद४ । 
सत जत सुमिरण भूल तों, जन्म गमाया बाद५ ॥१८॥ 
जीव१ ने जगत में आकर मनुष्य३ जाति४ में जन्म लिया२ और सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य, हरिनाम स्मरण को भूला रहा तो उसने मनुष्य जन्म व्यर्थ५ ही खो दिया । 
मिनखा देह अलभ्य१ धन, जा में भजन भंडार । 
सो सु दृष्टि समझै नहीं, मानुष मुग्ध२ गंवार ॥१९॥ 
मनुष्य देह दुर्लभ१ धन है, जिसमें भजन रूप भंडार प्राप्त होता है, उसको विषयों से मोहित२ मूर्ख प्राणी सु विचार दृष्टि से समझ नहीं पाता । 
एक१ अलिफ२ को यहु किया, आदम३ का औजूद४ । 
रज्जब समझो यहु सुखन५, मालिक है मौजूद ॥२०॥ 
आदि२ अद्वैत१ ब्रह्म की प्राप्ति के लिये वा एक नाम२ स्मरण के लिये ही यह मनुष्य३ शरीर४ उत्पन्न किया है, यह संतों से विचार५ करके समझो फिर तो प्रभु तुम्हें अपने में ही उपस्थित भासेगा । 
(क्रमशः)

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