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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*हम पर पावस नृप चढि आयौ ।*
*बादल हस्ती हवाई दामिनि,*
*गरजि निसान बजायौ ॥(टेक)*
*पवन तुरङ्गम चलत चहुं दिश,*
*बून्द बान झर लायौ ।*
*दादुर मोर पपीहा पाइक,*
*मारै मार सुनायौ ॥१॥*
*दशहू दिशा आइ गढ घेर्यौ,*
*बिरहा अनल लगायौ ।*
*जइये कहां भागि कैं सजनी,*
*रजनी दुन्द उठायौ ॥२॥*
*को अब करै सहाइ हमारी,*
*पिय परदेश हि छायौ ।*
*सुन्दरदास बिरहनी ब्याकुल,*
*करिये कौंन उपायौ ॥३॥*
हम पर इस वर्षा ॠतु नृप ने आक्रमण कर दिया है । मेघ रूप हाथी ने हवा में गरजते हुए यह युद्धवाद्य बजा दिया है ॥टेक॥
ये बरसाती हवा के घोड़े चारों और् दौड़ धूप कर रहे हैं । वर्षा की बूँदों ने सिर पर बाण बरसाने आरम्भ कर दिये हैं । दादुर(मेंढक), मोर एवं पपीहा भी अपनी मारक ध्वनि सुना कर मेरी हत्या का ही षड्यन्त्र रच रहे हैं ॥१॥
इनने सभी दिशाओं से आकर मेरे शरणस्थल(गढ़) को घेर लिया है । प्रियवियोग ने मेरे समस्त शरीर में अग्नि प्रज्वलित कर दी है । ऐसी स्थिति में अब मैं भागकर जाऊँ भी तो कहाँ जाऊँ, उधर इस अन्धेरी रात्रि ने अलग द्वन्द्व मचा रखा है ॥२॥
ऐसी दयनीय अवस्था में हमारी सहायता कौन करे, जब कि मेर पतिदेव परदेश में ही विराजमान हैं । महाराज श्री सुन्दरदासजी कहते हैं – ऐसी अवस्था में विरहणी अतिशय व्याकुल है । अब रक्षा का क्या उपाय किया जाय ॥३॥
(क्रमशः)

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