शुक्रवार, 7 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(६१/६४)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण ।*
*गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*अज्ञान कसौटी का अंग ७९* 
दारु१ देह में चक्र रग२, पावक प्राण३सु नाँहिं । 
रज्जब राह४ तिनहुं परै, साधू सुरति सु जाँहिं ॥६१॥ 
काष्ट१ में जो गोल चिन्ह और लम्बी लकीरें होती है, वे सब काष्ट में रहने वाले अग्नि में नहीं होते, वैसे ही चक्र और नाड़ियाँ२ देह में हैं, प्राणी३ में नहीं हैं, परब्रह्म प्राप्ति का मार्ग४ उन नड़ी-चक्रों से परे है संतजन वृत्ति द्वारा ब्रह्म चिन्तन करके ही ब्रह्म को प्राप्त होते हैं । 
चक्रहु चित अटकै नहीं, खोड़ि१ सहित षट् स्थान । 
रज्जब रज२ ह्वै जाहिंगे, मन उनमन३ लै४ सान५ ॥६२॥ 
शरीर१ के सहित षट् चक्रों के स्थानों में मन नहीं अटकना चाहिये, ये सब तो धूलि२ हो जायेंगे, इसलिये मन को लय योग४ द्वारा समाधि३ में ले जाकर अपने को ब्रह्म में मिला५ । 
आँख्यों अंजन बाहिया१, सदगुरु शोधि विचार । 
भरम न भासै साधना, सूझ्या नाम अधार ॥६३॥ 
सदगुरु ने खोज करके विचार रूप अंजन हमारे मति नेत्रों में डाल१ दिया है अब हमें दिख गया है कि विश्व के आधार ब्रह्म का नाम चिन्तन ही मुक्ति का हेतु है, इसमें भ्रमरूप साधना हमें कल्याण की हेतु नहीं भासती । 
धोखे धुन१ मुनि छोड़ कर, शोधै नाड़ी चक्र । 
रज्जब भूले नाम निधि, टलतों खाई टक्र ॥६४॥ 
मुनिजन धोखा से नाम की रट१ को छोड़कर नाड़ी चक्रों का शोधन करते हैं, जो नाम निधि को भूलकर भगवान से टले हैं, उन्होंने तो संसार में टक्करें ही खाई हैं । 
(क्रमशः)

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