#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साक्षीभूत का अँग ३५*
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विनती - अँग के अनन्तर साक्षी स्वरूप का विचार करने के लिये "साक्षी भूत का अँग" निरूपण में प्रवृत्त हुये मँगल कर रहे हैं -
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दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत : ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक भ्रम से पार हो, साक्षी के स्वरूप को पहचान कर परब्रह्म को प्राप्त होता है, उन निरँजन राम, सद्गुरु और सर्व सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
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*भ्रम विध्वँसन*
सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरे साखि ।
दादू साबित१ सो सही२, दूजा और न राखि ॥२॥
साक्षी सम्बन्धी भ्रम दूर कर रहे हैं - जो सँपूर्ण साँसारिक प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों को देखने वाला है तथा आन्तर हृदय में जो साक्षी भरता है अर्थात् चेतन ही सत्य है, ऐसी भावना होती है, वही यथार्थ२ सिद्ध१ होती है । अत: अपने अन्त:करण में अन्य किसी को भी उपास्य रूप से मत रख ।
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माँहीं तैं मुझ को कहै, अंतरजामी आप ।
दादू दूजा धँध है, साचा मेरा जाप ॥३॥
स्वयँ अन्तर्यामी परमात्मा साक्षी रूप से अन्त:करण में स्थित होकर हमको प्रेरणा करते हैं - "सत्य तो मेरा चिन्तन ही है, अन्य सब आडम्बर है ।"
(क्रमशः)

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