शनिवार, 8 जून 2019

= १३५ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू आपा गर्ब गुमान तज,*
*मद मत्सर अहंकार ।*
*गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥*
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प्रेम का पात्र बाहर होता है लेकिन प्रेम भीतर होता है और यदि प्रेम है, जो कि मूल स्वभाव है आत्मा का, तो वो कहीं पर भी प्रक्षेपित हो सकता है चाहे पात्र उपलब्ध हो या ना हो । ठीक वैसे ही जैसे दीये का स्वभाव है रौशनी देना चाहे उसके पास कोई हो या ना हो लेकिन वो सदा ही ज्योति बिखेरता है।
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परमात्मा को हमारे न तो दीये जलाने की आवश्यकता है और न ही फूलों को चढ़ाने की, न ही मिष्ठान के भोग लगाने, क्योंकि ये सब उसी के है, और उसी के लिए है। दीये की रोशनी भी उसी की, फूल भी उसी ने ही खिलाए है, मिष्ठानों में मीठा भी उसी का है, सब कुछ उसी का ही तो है, हमारे देने से थोड़े ही उसको मिलता है, उसे तो मिला ही हुआ है, हमारे देने का कोई अर्थ ही नहीं, जो है ही उसका, उसे हम दे भी कैसे सकते हैं । 
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परमात्मा को यदि देना ही है, तो अहोभाव, धन्यवाद, प्रेम, करुणा, चित्त की पवित्रता के ही देने का मूल्य है, और तो कुछ दिया ही नहीं जा सकता। जब तक भीतर का अंधेरा स्थित है, तब तक मन्दिर में दीये जलाने का कोई मूल्य नहीं है । जिस दिन भीतर का अंधकार मिट जायेगा, उस दिन हर ओर मन्दिर ही मन्दिर होंगे, क्योंकि हर ओर वही तो दृश्य है ।
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जबकि श्री मानस में साफ कहा गया है प्रेम से बड़ा कोई कर्म नहीं पर प्रेम अकर्म है ।
कर्म प्रधान विश्व करि राखा, 
जो जस करहिं तस फल चाखा..
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जय जय श्री राधे

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