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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान ।*
*तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥*
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साभार ~ स्वामी Kaushik Chaitanya जी
सतसंग एक पारस है। जिस तरह पारस यदि लोहे से मिल जाये तो लोहा सोना हो जाता है पर जिस लोहे में जंग लग जाये वह सोना नहीं होगा। इसी तरह निष्कपट और प्रेम के साथ सतसंग करोगे तो पारस काम करेगा। सोने की तरह आत्मा जाग जायेगी हीरे की तरह निकल आयेगी, कपट भाव से सतसंग सुनोगे उसका असर नहीं होगा। मन साफ होगा तो मालिक अपने पास जगह देगा भवसागर पार करवायेगा। साफ मन अच्छे विचारों को जल्दी अपनाता है और उस पर अमल करता है। मन को साफ करने का सत्संग सब से आसान तरीका है।
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यह संसार मेंहदी के पत्ते की तरह ऊपर से हरा दीखता है, पर इसके भीतर परमात्मरूप लाली परिपूर्ण है l
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आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः।
तज्जयः संपदां मार्गो येनेष्टं तेन गम्यताम्॥
इन्द्रियों के असंयम को आपत्तियों का मार्ग कहा गया है और इन्द्रियों के विजय को संपत्ति(समृद्धि) का मार्ग कहा गया है। (दोनों में से) जिस मार्ग पर जाने की इच्छा हो, उस मार्ग पर जाओ।
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रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन का फेर।
जब नीकै दिन आई हैं, बनत न लगि हैं देर॥
अपने दिनों के फेर अर्थात् जब समय प्रतिकूल हो, को चुप हो कर देखें, व्यग्र-उग्र, क्षुब्ध-विक्षुब्ध न हों। जब समय अनुकूल होगा, तो बात बनने में देर नहीं लगेगी।
When our time is not in our favour we should wait quietly and not become anxious. As the time changes and become favourable, all will be alright.
धैर्य, आशा और आस्था जीवन पथ के प्रधान सहयात्री होते हैं।
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भगवान् क्या कोई खेती है कि आज बोयेंगे तो कल उपजेगा और परसों मिलेगा? क्या भगवान् कोई वृक्ष है, जिसे आज लगायेंगे तो बारह वर्ष में फल लगेगा? भगवान ऐसी चीज नहीं है। भगवान् तो वर्तमान में भी ज्यों-का-त्यों मौजूद है।
स्वामी श्री शरणानन्दजी
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लक्ष्य सही होना चाहिए ---साहिब।
काम तो दीमक भी दिन-रात करती है
पर वो निर्माण नहीं विनाश करती है।
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पारमार्थिक मार्ग में साधक को सांसारिक अनुकूलता(धन, मान, बड़ाई, आराम आदि)तभी तक बाधक प्रतीत होती है, जब तक उसमें सांसारिक सुखकी कुछ इच्छा या रुचि विद्यमान है।।
श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज
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हे प्रभु हमें ऐसी ज्योति दें कि हम अपने सबसे बड़े शत्रुओं काम, क्रोध और लोभ पर जीवन में नियंत्रण कर सकें।
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*पवित्रीकरण*
ईश्वर की इच्छा सदा ही गुरु के माध्यम से शिष्य की ओर प्रवाहित होती रहती है। यदि हम अपने अनुशासन को सही भाव से स्वीकार करें तो वह हमारे चरित्र को ऐसा बलवान बना देगा जैसा अन्य कुछ भी नहीं कर सकता।
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*'संसार हमारी आवश्यकता का अनुभव करे'- यह भौतिक उन्नति है।*
*'हमें संसार की आवश्थकता ना रहे’- यह आध्यात्मिक उन्नति है ।*

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