शनिवार, 8 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(६५/६८)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै ।* 
*सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*अज्ञान कसौटी का अंग ७९* 
चक्र भँवर जीव जल पड़हिं, देही सलिता१ थान । 
रज्जब उभय न भास हीं, पैठै२ भजन सु भान३ ॥६५॥ 
नदी१ के भँवर स्थल में जल पड़ जाता है किन्तु भँवर स्थान जल सूर्य३ में प्रवेश२ कर जाता है, तब भँवर भी नहीं दीखता, वैसे ही जो चक्रों में पड़ जाते हैं, वे भी जब सदगुरु उपदेश से भजन में लग जाते हैं तब देह में वे चक्र भी नहीं भासते अत: चक्रों में न पड़कर भजन में ही लगना लगना चाहिये । 
काया कोठे१ कमल रग, चक्र शोध मन मान । 
रज्जब रहसी क्यों तहाँ, जहाँ न ये अस्थान ॥६६॥ 
शरीर के कोष्ट१ रूप कमलों में तथा नाड़ियों में मन चक्र मान कर शोध रहा है, किन्तु जहाँ ये उक्त स्थान नहीं है, वहाँ नाड़ी चक्र कहां रहेंगे । 
नाड़ी चक्र न श्वास मन, ब्रह्माण्ड पिंड नहिं ठौर । 
जन रज्जब युग युग रहै, सो ठाहर कोउ और ॥६७॥ 
जहाँ नाड़ी चक्र, श्वास, मन, ब्रह्माण्ड तथा पिंड रूप स्थान नहीं हैं और जो युग युग में स्थिर रहता है, वह स्थान उक्त स्थानों से कोई और ही है, उसी को ब्रह्म कहते हैं, विचार द्वारा शोधन करके उसी ब्रह्म में अपने को लय करना चाहिये । 
अह१ निशि मन उनमन२ में राखी, 
नाड़ी चक्र साखि३ सुन नाखी४ । 
साधु वेद सुमिरण कहै सार५, 
रज्जब रटै सो उतरै पार ॥६८॥ 
संतों की साक्षी३ सुनकर नाड़ी-चक्र शोधन रूप साधन छोड़ो४ और दिन१ रात मन को सहज समाधि२ में रक्खो, संत तथा वेद, स्मरण रूप साधन को ही श्रेष्ठ५ कहते हैं, जो निरंतर नाम-चिन्तन करता है, वह संसार-सागर से पार जाकर ब्रह्म को प्राप्त होता है । 
(क्रमशः)

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