#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*यह भांति सब ही जगत झूलै,*
*छ रुति बारह मास ।*
*पुनि मुदित अधिक उछाह मन मैं,*
*करत बिबिधि बिलास ॥*
*यौं झूलतैं चिरकाल वीत्यौ,*
*होत जनम बिनास ।*
*तिनि हारि कब हूं नांहिं मानी,*
*कहत सुन्दरदास ॥४॥*
इस रीति से यह समस्त जगत् छह ॠतू एवं बारह मास पर्यन्त निरन्तर झूलता रहता है । पुनः मन में अतिशय उत्साहित होता हुआ नाना प्रकार के सुख मानता है । इस प्रकार से झूलते हुए इसको बहुत समय बीत गया, ऐसे में ही इसका जन्म एवं विनाश होता गया । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – परन्तु इन ने अपनी पराजय कभी स्वीकार नहीं की ॥४॥
(क्रमशः)

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