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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*इन फाग सबनि कौ घर षौयौ, हो ।*
*अहो हौं, कहत पुकारि पुकारि ॥(टेक)*
*सुनि सुनि लीला कृष्ण की हो,*
*दूनौं उपज्यौ काम ।*
*बूडे काली धार मैं हो,*
*कतहूं नहिं बिश्राम ॥१॥*
*पंडित पैडौ मारियौ हो,*
*कहि कहि ग्रन्थ पुरान ।*
*सूतौ सर्प जगाइयौ हो,*
*फिरि फिरि लागौ षान ॥२॥*
इन फाग(वसन्त) उत्सवों ने सबके घर विनष्ट कर दिये । हाँ, यह बात मैं प्रत्यक्षतः सबके सन्मुख गम्भीर स्वर से स्पष्ट कह रहा हूँ ॥टेक॥
(पहला उदहारण) – भागवत्, महाभारत आदि से कृष्ण द्वारा कृत रासलीला का वर्णन सुन सुन कर कितने ही घर विनष्ट हो गये । उससे उनके हृदय में काम का उद्वेग द्विगुणित हो गया । उनको कहीं विश्राम(शान्ति) नहीं मिला ॥१॥
पंडित(कथावाचक) ने भागवत की रासलीला का वर्णन सुनाकर अपनी वाक्कुशलता दिखा दी । उसने अपने यह वाक्कुशलता क्या दिखायी, मनुष्यों के हृदय में सुप्त सर्प को जगा दिया कि वह घूम घूम कर जन समूह को ही डंसने लगा ॥२॥
(क्रमशः)

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